Thursday, June 9, 2011

अमरीका में एक और मंदी के आसार


अमरीकी अर्थतंत्र में एक और मंदी आने के आसार व्याप्त हैं। 31 मई को अमरीका के शेयर बाजारों में ग्रीस को एक और बेलआउट पैकेट मिलने की उम्मीद में तेजी आई थी लेकिन अगले ही दिन 1 जून को अमरीकी शेयर बाजारों में अगस्त 2010 के बाद की सबसे बड़ी गिरावट ने यह संकेत दे दिये कि अमरीकी अर्थव्यवस्था संकट के दौर से गुजर रही है। यह गिरावट आज तक जारी है। कल अमेरिकी फेडरल रिजर्व के चेयरमैन बेन बर्नानके ने स्वीकार किया कि अमरीकी अर्थव्यवस्था में सुस्ती आ गई है। हालांकि मंदी से उबरने के लिए किसी तरह की कदम उठाने की घोषणा नहीं की गई है। बाजार को उम्मीद थी कि फेडरल रिजर्व तीसरे राहत पैकेज की घोषणा कर सकता है परन्तु ऐसा नहीं हुआ।

अमरीकी राष्ट्रपति का चुनाव नजदीक आता जा रहा है। वर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा जनता के मध्य अपनी छवि को दूसरे देशों की प्रभुसत्ता के उल्लंघन द्वारा, जिसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान में बिना पाकिस्तानी सरकार को बताये घुस कर ओसामा बिन लादेन का शिकार करना रहा है, निखारने और जनप्रिय होने का प्रयास कर रहे हैं परन्तु वे अपना घर ठीक तरह से नहीं चला पा रहे हैं। अमरीकी अर्थव्यवस्था संकटों से उबर नहीं पा रही है और हालात यहां तक पहुंच गये हैं कि अमरीका द्वारा अपने कर्जों और उस पर ब्याज की अदायगी में डिफाल्टर होने की कगार पर पहुंच गया है। पूरी दुनियां में उसके इस संकट से कई देशों की सरकारें चिन्ताग्रस्त हैं। चीन के केन्द्रीय बैंक के एक सलाहकार ली डाउकोई ने बुधवार 8 जून को कहा कि अगर अमरीकी सरकार अपने ऋणों की अदायगी में डिफाल्ट करती है तो वह आग से खेलेगी। ज्ञातव्य हो कि चीन अमरीकी सरकार को ऋण देने वाला दुनिया का सबसे बड़ा निवेशक है जिसने 1.14 ट्रिलियन अमरीकी डालर अमरीकी सरकार को उधार दे रखे हैं। भारत ने भी अमरीकी सरकार को 39.8 बिलियन अमरीकी डालर अमरीकी सरकार को उधार दे रखे हैं और भारतीय रिजर्व बैंक मामले पर नजर रखे हुये है।

अमरीकी अर्थव्यवस्था का घाटा इस साल 1.4 ट्रिलियन अमरीकी डालर तक पहुंचने के उम्मीद जताई जा रही है और इसे कम करने के लिए ओबामा प्रशासन हर सम्भव उपाय करने के प्रयास कर रहा है।

अगर अमरीकी ट्रेजरी ऋणों पर ब्याज की अदायगी नहीं कर पाती है तो अमरीकी अर्थव्यवस्था के एक बार फिर मंदी से घिरने की आशंका पूरे विश्व में जतायी जा रही है। अगर ऐसा होता है तो अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा बाजार में डालर के नीचे गिरने की पूरी संभावना है।

बार-बार मंदी का शिकार होना पूंजीवादी व्यवस्था का अंतर्निहित चरित्र है। इसे रोके जाने के प्रयास तो किये जा सकते हैं लेकिन इसे अधिक दिनों तक टाला नहीं जा सकता है। सम्प्रति जिस तरह का अंतर्राष्ट्रीय अर्थतंत्र काम कर रहा है, उसमें अमरीकी अर्थव्यवस्था के मंदी में जाने से पूरे विश्व की अर्थव्यवस्थाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता। चीन के एक अर्थशास्त्री ने तो स्वीकार किया है कि यदि अमरीका अपने ऋणों और उस पर देय ब्याज में डिफाल्ट करता है, तो उसका असर चीनी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

- प्रदीप तिवारी

2 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

मंदी पूंजीवाद का भीषणतम लक्षण है जो न जाने कितने मनुष्यों को लील लेता है। अब तो इस के आने की अवधि भी न्यूनतम स्तर पर आती जा रही है। लगता है कुछ समय बाद ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है कि मंदी लौट कर जाए ही नहीं।
तब?
शायद तब नियंत्रित अर्थव्यवस्था ही एक मात्र चिकित्सा शेष रहे। क्या कहेंगे उसे समाजवाद या कुछ और?

Vijai Mathur said...

उत्पादन और वितरण के साधनों पर समाज का नियंत्रण ही 'समाजवाद'है.यह सरकार के माध्यम से भी हो सकता है और सहकारी संस्थाओं के माध्यम से भी.
जब बार-बार मंदी आती रहेगी तब वही विकल्प बचेगा.