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Saturday, May 9, 2015

एक प्रासंगिक वर्षगांठ

9 मई फासीवाद पर जीत की 70वीं वर्षगांठ है। इसे मनाये जाने की आवश्यकता है ना केवल असंख्य लोगों द्वारा किये गए सर्वोच्च बलिदानों, विशेषकर पूर्व सोवियत संघ की लाल सेना के कारण बल्कि इससे भी अधिक अन्तर्राष्ट्रीय और घरेलू दोनों मोर्चों पर सामाजिक आर्थिक विकास के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता के लिए भी। काफी विकसित अर्थव्यवस्थाएं 2008 में शुरू हुई आर्थिक मंदी के कारण आर्थिक संकट में फंस गयी हैं और अभी भी नव उदारवाद के संरक्षक इसे बड़ी मंदी का नाम दे रहे हैं और फासीवादी रूझानों के शासन तहत आ रहे हैं। अन्तर्राष्ट्रीय वित्त पंूजी के आर्थिक हितों की सेवा करने वाली राजनीतिक शक्तियां इन देशों में सभी विभाजक मतांध नारों का सहारा ले रही हैं जिसमें आप्रवास के विरोध की पकड़ में रहने वाला नस्लवाद भी शामिल है। वैश्विक मंदी पंूजीवाद का नियमित संकट नही है बल्कि यह दुनिया में अपना राजनीतिक और आर्थिक वर्चस्व कायम करने के लिए वित्त पंूजी द्वारा चले जा रहे विशेष दांव के कारण है। वित्त पंूजी के इस संकट से निकलने में विफल रहने के कारण इसके बोझ को विकासशील देशों, विशेषकर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और उनके लोगों पर डाल रही है। युद्ध और तनाव थोपे जा रहे हैं, ना केवल प्राकृतिक संसाधनों पर उनका नियंत्रण बनाये रखने के लिए बल्कि युद्ध उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए, विशेषकर सेना और उद्योग गठजोड़ के लिए। दुनिया फासिवादी हमले के गंभीर खतरे का सामना कर रही है और वित्त पंूजी अपना वर्चस्व कायम रखने के लिए और अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।
घरेलू स्तर पर भी कारपोरेट पंूजी, दक्षिणपंथी विचारधारा और फासीवादी रूझानों वाली सांप्रदायिकता के निकृष्तम रूप वाली नरेन्द्र मोदी सरकार के आने के कारण देश एक बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। सत्ता में आने का इसका इस महीने एक साल पूरा होने वाला है। इस छोटे से समय में ही यह सरकार आपना सामाजिक और आर्थिक चेहरा पूरी तरह बेनकाब करवा चुकी है। पिछली सरकार की तरह ही यह सरकार भी पूरी तरह से आर्थिक नव उदारवाद को लागू करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। जैसे कारपोरेट पंूजी ने उसे सत्ता में लाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाया तो मोदी सरकार भी बेशर्मी और नंगई से बचे हुए नव उदारवाद के एजेंडे को ‘‘सुधार प्रक्रिया‘‘ के नाम पर आगे बढ़ा रही है। इसमें प्रत्येक संभावित छूट की बारिश कारपोरेट घरानों और बहुराष्ट्रीय निगमों पर की गई है और मजदूर वर्ग द्वारा लड़ कर हासिल किये गए अधिकारों को कुचलने के लिए एक के बाद एक कानून बनाये जा रहे हैं। यह स्पष्ट है कि “श्रम सुधार“ इसके लिए सरकार का अर्थ केवल पंूजीपतियों को मजबूत करके श्रमिकों के अधिकारों को बेदर्दी से खत्म करने और हायर एण्ड फायर की नीति को थोपने से है। 
इसके साथ ही, इसने साफ कर दिया है कि उसमें जनता के जनवादी अधिकारों और जनवादी व्यवस्था के प्रति कोई सम्मान नही है।
संसदीय जनवाद को सोची समझी योजना के तहत अपमानित किया जा रहा है। सरकार अपना आर्थिक एजेंड़ा आगे बढ़ाने के लिए अध्यादेश राज की राह पकड़ रही है। इसके अलावा जनता को अधिकार प्रदान करने वाले कुछ कानून भी संशोधन की सूची में हैं। सूचना का अधिकार अधिनियम और व्हिसिल ब्लोअर की सुरक्षा का कानून विशेषकर इस हिट लिस्ट में हैं। यह भ्रष्टाचार की सुरक्षा करने के लिए भी है। 
जनता पर नए आर्थिक बोझ लादे जा रहे हैं। अनिवार्य वस्तुओं के दाम विशेषकर खाद्य वस्तुएं जिसमें अनाज और दालें शामिल हैं नई सरकार के तहत आसमान छू रहे हैं। सरकार को जनता की दुर्दशा की कम ही चिंता है। यह अच्छे दिन सब इनके अपने लोगों के हैं। इसे सुनियोजित तरीके से किया जा रहा जाति और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण दोगुना कर रहा है। मोदी-अमित शाह की जोड़ी द्वारा किया जा रहा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण केवल राजनीतिक रणनीति के आधार पर ही नही है बल्कि इसे जनता का ध्यान उनकी वास्तविक सामाजिक आर्थिक समस्याओं से हटाने के लिए भी किया जा रहा है। एक प्रभुत्ववादी मनोदशा के मुखिया वाली सरकार देश को एक फासीवादी सत्ता को सुपूर्द करने के लिए इन सभी आर्थिक, सामाजिक और सांप्रदायिक हालात को पका रही है। 
इन परिस्थितियों में एक अनेकों सर वाले राक्षस का कोई एक पहलू लेने का कोई उपयोग नही होगा। खतरे को संपूर्णता में देखा जाना चाहिए और उससे समग्रता में लड़ा जाना चाहिए। जब सांप्रदायिकता के खिलाफ और धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए एक संभावित एकता की कोशिश कर रहे हैं, हमें जनता को लामबंद करके वैकल्पिक नीतियों के लिए लड़ने के लिए सड़कों पर लाना होगा। इन दोनों को साथ लेकर ही सभी पंूजीवादी राजनीतिक दलों और बुनियादी रूप से उनके नव उदारवाद नीतियों के प्रति प्रतिबद्धता का विकल्प बनाने के लिए जनता को जागरूक बनाने की आवश्यकता है। एक वाम जनवादी विकल्प बनाने का यही रास्ता है जोकि फासीवादी कब्जे के खतरे को विफल करेगा।
(”मुक्ति संघर्ष“ का सम्पादकीय)

Thursday, October 31, 2013

जनरल सिंह का मकसद क्या है?

सेना के सीक्रेट फण्ड का गलत इस्तेमाल करने और संकट का सामना कर रहे राज्य जम्मू कश्मीर मे सत्ता परिवर्तन के लिये राजनेताओं को रिश्वत देने के आरोपों की जांच की गुप्त रिपोर्ट का लीक होना एक दुर्घटना थी अथवा यह एक सोचा समझा काम था इस पर लंबे समय तक कयास लगाये जाते रहेंगे। इसने राजनेताओं को एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप का मौका दिया है। इंडियन एक्सप्रेस की इस खबर का सरकार द्वारा खंडन नहीं किये जाने के कारण यह मुद्दा सेना के अराजनीतिक चरित्र के नजरिये से काफी गंभीर हो गया है। यह एक बड़ी ही खराब तस्वीर पेश कर रहा है जहां सेना का एक मुखिया ना केवल राजनीति में शामिल है बल्कि गुटबाजी को बढ़ावा दे रहा है और इसे प्राथमिकता के आधार पर संबोधित किये जाने की जरूरत है।
प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार जनरल वी.के.सिंह ने सेना के गुप्तचर विभाग (आईएम) से अलग एक संदिग्ध सीक्रेट एजेंसी बनाई थी जिसे टेक्नीकल सपोर्ट डिवीजन (टीएसडी) का नाम दिया गया था और राजनीतिक मामलों में दखल करने के लिये इसको पैसा भी मुहैय्या कराया गया था। पूर्व सेना प्रमुख ने इस रिपोर्ट से इंकार नहीं किया बल्कि दावा किया कि सेना आजादी के बाद से ही राजनेताओं को पैसा दे रही है। इसका आठ पूर्व सेना प्रमुखों ने एक संयुक्त बयान द्वारा विरोध किया है। यह स्वाभाविक है कि जनरल सिंह ने जो दोनों काम किये हैं वह स्पष्टतया सेना के परंपरागत चरित्र के विपरीत हैं। जहां हमारे पड़ोसी देशों पाकिस्तान और बांग्लादेश में सेना सत्ता में आने के लिये तख्ता पलट करती रही है वहीं हमारी सेना ने अपने अराजनीतिक चरित्र को सावधानी से सहेज कर रखा है। वी.के.सिंह ने अपनी अवैध और असंवैधानिक गतिविधियों से इस पर एक सवालिया निशान लगा दिया है।
वास्तव में जनरल वी.के.सिहं अपना पदभार ग्रहण करने के पहले दिन से ही विवादों के घेरे में हैं। इनमें से अधिकतर विवाद स्वयं को प्रोजेक्ट करने के लिये ही है। इसके लिये उन्होंने अपने मातहातों को निशाने पर लेना शुरू किया उनके खिलाफ कार्यवाही की। उन्होंने सुकना जमीन घोटाले में लेफ्टिनेंट जनरल अवधेश कुमार के खिलाफ कोर्ट मार्शल का फैसला लिया और असम में एक सैनिक ऑपरेशन में विफल होने पर लेफ्टिनेंट जनरल दलबीर सिंह को सेंसर होने का नोटिस दे डाला। उनके यह कदम अब पलट चुके हैं।
उन्होंने अपनी जन्म तिथि को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी (वास्तव में अपनी सेनानिवृत्ति को लेकर) और इसके लिये वह सुप्रीम कोर्ट तक भी गये। एक ऐसी भी रिपोर्ट है कि जब सुप्रीम कोर्ट की जन्म तिथि याचिका पर फैसला आने वाला था सेना की दो टुकड़ियों ने बगैर सरकार को सूचित किये हिसार से दिल्ली की ओर कूच किया था। ऐसा भी आरोप लगाया जाता है कि जनरल की उस समय एक गुप्त मंशा थी परंतु सेना ने उस समय आगे बढ़ने से मना कर दिया था। अब सिंह के कुछ दोस्तों ने इसकी पुष्टि की है कि वह टुकड़ियां हिसार से चली थी, परंतु दावा किया जाता है कि उनका कोई गुप्त मकसद नहीं था। उनका तक है कि दिल्ली में पहले से ही 30 हजार के लगभग फौज है इसीलिये और हजार लोगों का चलना कोई मायने नहीं रखता है। यह बकवास है।
हिसार प्रकरण के बाद मीडिया में कयास लगाये गये कि सेना प्रमुख के वफादार रक्षामंत्री ए.के.एंटोनी के घर और दफ्तर पर घेरा डालने वाले थे। इसके लिये जासूसी करने की नई प्रौद्योगिकी का उपयोग किया गया था। इसी दौरान जनरल सिंह द्वारा सेना की तैयारियों की कमी और अप्रचलित हथियारों के उपयोग पर प्रधानमंत्री को लिखा गया पत्र मीडिया को प्राप्त हुआ था। इस तरह के पत्र को लिखने और इस गुप्त संवाद को लीक कर देने में असली मकसद क्या था।
जब यह सब तरकाबे काम नहीं कर सकी, तो जनरल सिंह ने एक और लक्ष्य साधना शुरू किया। उन्होंने खुलासा किया कि लेफ्टिनेंट जनरल तेजेन्दर सिंह ने उन्हें सेना के ट्रकों की डील को हरी झण्डी देने के लिये 14 करोड़ रू. की रिश्वत की पेशकश की थी। कई पहलुओं के साथ यह मामला अभी तक कोर्ट के समक्ष लंबित है।
जनरल सिंह ने माना है कि उन्होंने टीएसडी नामक सीक्रेट संस्था बनाई थी जो संदिग्ध कामों में संलग्न थी, उन्होंने दावा किया कि यह मानव इंटेलीजेंस के लिये थी। सेना की आंतरिक रिपोर्ट कहती है कि जनवादी ढंग से चुनी गई उमर अब्दुल्ला सरकार को गिराने के लिये धन का उपयोग किया गया। जनरल ने इस भुगतान का विरोध नहीं किया परंतु उन्होंने दावा किया कि सेना ऐसी गतिविधियों में आजादी के बाद से ही लिप्त है। यह सत्य है तो इसके विस्तार में जाने की आवश्यकता है और यदि जनतंत्र को जिंदा रखना है तो दोषियांे के नाम सामने आने चाहिए और उन्हें सजा मिलनी चाहिये।
अब इसके बाद एक संदिग्ध गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) को पैसा मुहैय्या कराने का मामला भी है। एनजीओ को पैसा सेना के दो वरिष्ठ अधिकारियों को रोकने के लिये जनहित याचिका दाखिल करने के लिये दिया गया था जिसमें जनरल सिंह का स्थान लेने वाले वर्तमान प्रमुख भी शामिल थे।
हालांकि शुरू में भाजपा ने रेवाड़ी रैली में जनरल द्वारा मोदी के साथ मंच की शोभा बढ़ाने के बाद जनरल का पूरी तरह समर्थन किया था परंतु जैसे ही जनरल की महत्वाकांक्षाओं और सेना के अराजनीतिक चरित्र को बर्बाद करने की उनकी गतिविधियों पर दूसरे खुलासे सामने आने लगे उनका रूख नरम पड़ गया। परंतु भाजपा के राज्यसभा में नेता सदन अरूण जेटली ने इस विवाद में एक नया पहलू जोड़ दिया है। वह ना केवल सेना के आंतरिक मामलों को लीक करने को लेकर सरकार पर राजद्रोह के आरोप लगा रहे हैं बल्कि ऐसे सारे ऑपरेशनों को बचाने के लिये उन्हें ‘‘पवित्र गाय’ की प्रतिष्ठा भी प्रदान कर रहे है जिसमें उन मुठभेड़ों का संचालन भी है जो बाद में झूठे मामले सिद्ध हुए। यहां तक कि उन्होंने इशरत जहां केस की जांच करने के लिये भी सरकार पर राजद्रोह का आरोप मढ़ दिया है। जैटली नहीं चाहते कि इस मामले की जांच अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचे। उन्हें मालूम है कि यह उनके प्रधानमंत्री पद के महत्वाकांक्षी उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी तक जा सकती है, जो कि अधिकतर झूठी मुठभेड़ों के मास्टर माइंड हैं। वह कहते हैं कि जनतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकार इंटेलिजेस ब्यूरो, रॉ. फौजी इंटेलिजेंस अथवा ऐसी ही किसी अन्य संस्था के पैसों की जांच नहीं कर सकते है कि उन्होंने यह पैसा कहां खर्च किया अथवा उचित ढंग से खर्च किया कि नहीं। इस प्रकार की गतिविधियां ना तो संसद के प्रति जवाबदेह है ना ही न्यायिक प्रणाली के प्रति।
इसीलिये जेटली संसदीय जनवादी व्यवस्था के ऊपर एक समान्तर व्यवस्था बनाने का तर्क दे रहे हैं। वास्तव में यह ‘‘पवित्र गाय’’ का यही तर्क है जिसका नरसिम्हा राव सरकार के समय रक्षा सौदों में किया गया था कि कोई इसे छेड़ नहीं सकता है ना ही इस पर बहस कर सकता है। पुरुलिया में हथियार गिराने के समय सरकार ने इसी तर्क का सहारा लिया था तो भाकपा के वरिष्ठ सांसद इंन्द्रजीत गुप्त ने ना केवल इसे संसद में धराशायी किया था बल्कि रक्षा मामलों की संसदीय समिति की अध्यक्षता से भी इस्तीफा दे दिया था।
- शमीम फैजी

Monday, May 23, 2011

पांच विधान सभाओं के चुनाव परिणाम


संचार माध्यम और वामपंथ के जाने-पहचाने विरोधी इस बेबुनियाद बिंदु पर जोर देने के लिए हर किस्म के सिद्धान्त और आक्षेप फैलाने में जुटे हैं कि वामपंथ की चुनाव में पराजय, खासकर पश्चिम बंगाल में पराजय का अर्थ है देश में वामपंथ का खात्मका। यह महज अनर्गल प्रलाप है।
यह सही है कि पश्चिम बंगाल में वामपंथ को एक बड़ा धक्का लगा है। विधान सभा चुनावों में लगातार सात बार की सफलताओं और लगभग साढ़े तीन दशक तक सत्ता में रहने के बाद वामपंथ सत्ता से बाहर हो गया है। पर यह ध्यान में रखना चाहिये कि वामपंथ साढ़े तीन दशक तक लगातार सत्ता में बना रहा जबकि जिस कांग्रेस को स्वाधीनता के बाद से सत्ता पर इजारेदारी थी, उसे दो दशकों से भी पहले जनता का कोप भाजन बनना पड़ा था और 1967 में नौ राज्यों में सत्ता से हाथ धोना पड़ा था। वाम मोर्चा का लगभग साढ़े तीन दशक तक सत्ता पर बने रहना स्वयं में बहुपार्टी लोकतंत्र के इतिहास का रिकार्ड बन गया है और यह उस समय तक एक रिकार्ड बना रहेगा जब तक वाममोर्चा भविष्य के चुनावी संघर्ष के लिए फिर से अपनी कमर कसता है और नया रिकार्ड स्थापित करता है।
कांग्रेसजन तथ्यों के खंडन-मंडन का मजाक बनाने में हदों को पार कर रहे हैं। सबसे अधिक उपहासास्पद बात तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने कही। उन्होंने चटखारे लेते हुए कहा कि प. बंगाल में वाममोर्चा को पटक कर दो अंकीय आंकड़े पर ला दिया गया है। वह बड़े मजे से भूल गये कि इसी चुनाव में तमिलनाडु विधानसभा में उनकी पार्टी एक ही अंक में सिमट कर रह गयी है जहां कांग्रेस को 294 स्थानों में से मात्र पांच स्थान ही मिले हैं। इसके अलावा केरल में कांग्रेस सत्ता में तो जरूर आ गयी है पर वह नई विधान सभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में नहीं आ सकी। यह सम्मान तो वामपंथ की ही पार्टी ने अपने पास बनाये रखा। इसी प्रकार, उन्होंने इस तथ्य को भी नजरंदाज करने की कोशिश की कि उनकी पार्टी से पुडूचेरी में सत्ता छिन गयी है, आंध्र प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लोकसभा के लिए दो उपचुनावों में उन्हें अपमानजनक तरीके से शिकस्त का मुंह देखना पड़ा; और कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश में विधानसभा के लिए सभी उपचुनावों में कांग्रेस के हाथ विफलता ही लगी।
पर इस खंडन-मंडन को यही छोड़ते हैं। दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों और उनके दूसरे वामपंथी सहयोगियों ने सही ही कहा है कि प. बंगाल में वामपंथ को मिली जबर्दस्त हार के लिए गहन आत्म विश्लेषण, और राजनैतिक, सरकारी और संगठनात्मक - सभी क्षेत्रों में अपने कामकाज की समीक्षा की जरूरत है। स्वाभाविक ही है कि एक सांगोपांग समीक्षा के लिए वामपंथी पार्टियों के नेतृत्वकारी निकायों को कुछ समय की जरूरत होगी क्योंकि संबंधित राज्यों की पार्टी इकाईयों द्वारा समीक्षा इस दिशा में पहला कदम होगा।
इस बीच कुछ बातें सुस्पष्ट हैं। वामपंथ को कुछ बुनियादी मुद्दों - जैसे कि आधारभूत जनता के साथ हमारे संबंधों और जुड़ाव, प्रशासन में पारदिर्शता, सत्ता का अहंकार और कुछ हद तक भ्रष्टाचार जो विभिन्न स्तरों पर हमारे संगठनों में घर कर गया है - पर आत्म निरीक्षण की जरूरत है। जनता के जो तबके इन तमाम तीस वर्षों में हमारा समर्थन करते रहे हैं, इन तमाम बातों के बीच परिवर्तन की भावना को पैदा किया जिसका इस बात अप्रत्याशित रूप में कहीं अधिक एकताबद्ध वाम विरोधी ताकतों ने पूरा दोहन किया है। यदि आंकड़ों को देखें तो यह काफी सुस्पष्ट है कि हर किस्म की वाम विरोधी ताकतों की एकता ने वाम मोर्चा की हार में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। यह चुनाव वाम मोर्चा और बाकी के मध्य एक दो-धु्रवीय लड़ाई में बदल गया। वाम मोर्चा यद्यपि 62 ही स्थानों पर जीत पाया पर उसे 41 प्रतिशत से थोड़ा अधिक मत प्राप्त हुए।
पर इससे हमें इस गलत नतीजे पर नहीं पहुंचना चाहिए कि मतदाताओं के कुछ तबकों ने पक्ष नहीं बदला है। सबसे अधिक सुस्पष्ट शिफ्ट है मुस्लिम समुदाय की जो राज्य के कुल मतदाताओं का 27 प्रतिशत हैं। हालांकि वाममोर्चा के विरूद्ध मतदान करने के बाद भी, एक आम मुसलमान यही कहेगा कि केवल कम्युनिस्ट ही हैं जिनकी धर्मनिरपेक्षता के लिए प्रतिबद्धता पर उंगली नहीं उठायी जा सकती, पर वाम मोर्चा सरकार ने अपने शासन के इन तमाम वर्षों में उनके जीवन और उनकी सम्पत्ति को जो सुरक्षा प्रदान की है, वही पर्याप्त नहीं है। अन्य लोगों की तरह उन्हें भी विकास के लाभ में हिस्सा मिलने की जरूरत है। दुर्भाग्य से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा बार-बार याद दिलाये जाने के बावजूद वाम मोर्चा ने शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा और रोजगार जैसी उनकी बुनियादी ललक और आकांक्षाओं की अनदेखी की।
यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसके मामले में सही तरह से जुटने की जरूरत है न केवल उस समय जब हम सत्ता में वाप आते हैं बल्कि अल्पसंख्यकों के बीच हमारे कामकाज के कुल दृष्टिकोण में इस पर ध्यान रखने की और इस दिशा में जुटने की जरूरत है।
इसी प्रकार, उद्योगीकरण के प्रश्न पर पूर्ण, सम्यक एवं गहन सोच-विचार की जरूरत है। नंदीग्राम के समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक कोलकाता में चल रही थी। राष्ट्रीय परिषद ने कृषि योग्य भूमि को बचाने और बेदखल हुए किसानों के पुनर्वास के प्रश्न पर एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया था। हमें उस प्रस्ताव में प्रतिपादित दो बुनियादी बातों पर दृढ़ता से जमे रहना चाहिये। पहली बात - सरकारों के पास बुनियादी ढांचों और जनोपयोगी सेवाओं को खड़ा करने के अलावा अन्य किसी उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहण का अधिकार नहीं होना चाहिए। अन्य सभी उद्देश्यों के लिए बाजार का नियम लागू होना चाहिये। दूसरी बात - उसमें भी, बहुफसली जमीन के अधिग्रहण या खरीदारी से यथासंभव बचा जाना चाहिए। इस प्रश्न पर व्यापक गलतफहमी के कारण यद्यपि हम सत्ता खो चुके हैं, तो भी इस मुद्दे पर तत्काल ध्यान देना जरूरी है क्योंकि देश के विभिन्न हिस्सों में अन्य अनेक नंदीग्राम और सिंगूर सामने उभर कर आ रहे हैं।
प. बंगाल में वाम मोर्चा का केवल एक ही विकल्प है और वह है एक ऐसा वाम मोर्चा जो अपने कामकाज में कहीं अधिक पारदर्शी और लोकतांत्रिक हो, जिसमें छोटे बड़े सभी भागीदारों की राय को वाजिब महत्व दिया जाये। वाम मोर्चा के घटकों की हिस्सेदारी में उनके प्रभाव की जमीनी वास्तविकता झलकनी चाहिये। वाम मोर्चा की कोई पार्टी अपने को दूसरों से बड़ा समझे इस तरह के रूख से वाम मोर्चा को और कुल मिला कर प. बंगाल की जनता को नुकसान पहुंचेगा। वामपंथ ने घोषित किया है कि वह रचनात्मक और उत्तरदायी विपक्ष की भूमिका अदा करेगा। वह जनता की उपलब्धियों की मजबूती एवं दृढ़ता से रक्षा करेगा पर तृणमूल कांग्रेस की तरह अवरोध और टकराव का रूख नहीं रखेगा। दुर्भाग्य से नये शासक गठबंधन ने इसे सही तरीके से नहीं समझा है। वाम कार्यकर्ताओं और पार्टी दफ्तरों पर हमलों की खबरें लगातार आ रही हैं।
केरल में एक बार एलडीएफ तो दूसरी बार यूडीएफ के सत्ता में आने की प्रवृत्ति रही है। इस बार केरल इस प्रवृत्ति को बदल कर इतिहास रचने के कगार पर ही पहुंच गया था। एलडीएफ केवल तीन स्थान कम मिलने के कारण सत्ता से दूर रह गया। दोनों मोर्चों को मिलके मतों का अंतर एक प्रतिशत से भी कम रहा। दोनों के बीच केवल 0.89 प्रतिशत का अंतर रहा। एलडीएफ को श्रेय जाता है कि अपनी सत्ता के पिछले पांच वषों में उसने न केवल पहले से कहीं अधिक पारदर्शी तरीके से शासन किया बल्कि आर्थिक नवउदारवाद की बुराईयों जैसे कि महंगाई, सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ध्वंस और भ्रष्टाचार आदि के विरूद्ध भी उसने दृढ़तापूर्वक संघर्ष किया। एलडीएफ ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत किया, उसके दायरे को बढ़ाया जिससे जनता को महंगाई से बड़ी राहत मिली। हमारे विरोधियों को भी इसकी प्रशंसा करनी पड़ी। इसी प्रकार, पिछले पांच वर्षों में एलडीएफ ने घाटे में चल रहे 38 सार्वजनिक क्षेत्र प्रतिष्ठानों से 33 की जीर्णोद्धार किया और वे मुनाफा कमाने लगे। इससे हजारों लोगों के रोजगार का बचाव हुआ। यूडीएफ के एक पूर्वमंत्री को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सजा सुनायी जाने और यूडीएफ के एक अन्य पूर्वमंत्री के यौन एवं भ्रष्टाचार घोटाले के पर्दाफाश से न केवल मुख्यमंत्री को निजी तौर पर बल्कि समूचे एलडीएफ को जनता से सराहना मिली। इन बातों के अलावा, एलडीएफ की प्रमुख पार्टियों के बीच (और पार्टियों के स्वयं के अंदर भी) यदि उद्देश्ययुक्त एकता एवं जुड़ाव कुछ और अधिक रहा होता तो उससे वाम मोर्चा को राज्य में दो मोर्चों के एक के बाद दूसरे के सत्ता में आने की आम प्रवृत्ति को रोकने में निश्चय ही कामयाबी मिल सकती थी।
इसी प्रकार तमिलनाडु का जनादेश अत्यंत स्पष्ट है। यह डीएमके के भ्रष्ट पारिवारिक शासन और कांग्रेस जैसे उसके समथर्कों-रक्षकों के विरूद्ध जनादेश है। इसी प्रकार पुडुचेरी की जनता ने एक अपेक्षाकृत ईमानदार एवं सरल व्यक्ति, जिसे कांग्रेस से निकाल दिया गया था, का वरण किया है।
असम में, कांग्रेस को विप्ख की फूट का फायदा मिला। इसके अलावा उल्फा के एक घड़े के साथ वार्ता शुरू कर टिकाऊ शांति एंव स्थिरता का जो भ्रम उसने पैदा किया, उसका भी कांग्रेस ने फायदा उठाया। असम के लोग शांति चाहते हैं। यह केन्द्र सरकार और नई राज्य सरकार की जिम्मेदारी होगी कि वे असंतुष्ट तत्वों के साथ वार्ता की प्रक्रिया तो आगे बढ़ायें, राज्य में शांति को सुनिश्चित करें और सभी जातीय एवं अन्य समस्याओं का समाधान करें।
चुनाव की जीत की वास्तविक एवं काल्पनिक खुशियों और कुछ ताकतों की हार के हल्ले-गुल्ले के बीच इन चुनावों के एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम की अनदेखी नहीं करनी चाहिये। केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 24 स्थानों पर चुनाव लड़ा और 20 स्थान जीते। असम में मुस्लिम संगठन एआईयूडीएफ ने अपने स्थानों को 11 से बढ़ाकर 18 कर लिया। इसी प्रकार भाजपा के साथ गठजोड़ के ममता बनर्जी के संदिग्ध रिकार्ड के बावजूद बड़ी संख्या में मुसलमानों ने उनका पक्ष लिया। इन प्रवृत्तियों पर सम्यक एवं पूर्ण अध्ययन की जरूरत है।
एक अन्य कारक है निरंतर बढ़ते मध्यम वर्ग के चरित्र और आकांक्षाओं में बदलाव। मध्यम वर्ग यद्यपि अधिकाधिक ‘उपभोक्तवादी’ और ‘कैरियर उन्मुख’ हो रहा है, सब मिला कर वह जनमत निर्माण की एक बड़ी भूमिका का निर्वाह भी कर रहा है। वामपंथ को इन रूझानों एवं कारकों पर और नई पीढ़ी पर ध्यान देना होगा।
- शमीम फैजी

- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, उत्तर प्रदेश राज्य परिषद