Wednesday, March 16, 2016

जेएनयू प्रकरण और वामपंथ पर किये जा रहे हमलों को जनता के बीच ले जायेगी भाकपा

लखनऊ 16 मार्च। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य कौंसिल की दो दिवसीय बैठक आज यहां सम्पन्न हुई। बैठक की अध्यक्षता सेवानिवृत्त अपर जिलाधिकारी का. बी. राम ने की।
बैठक में जेएनयू प्रकरण और उसके बाद के हालात, मुजफ्फरनगर दंगों की रिपोर्ट, आरक्षण आन्दोलन, रेल तथा आम बजट आदि राष्ट्रीय सवालों और उत्तर प्रदेश के हालातों पर विस्तार से चर्चा हुई।
चर्चा के बाद भाकपा ने अपने आगे के कामों का निरूपण भी किया। संघ परिवार द्वारा लादी जा रही तानाशाही और साम्प्रदायिकता का पूरी शिद्दत से जवाब देने के लिए शहीदे आजम भगत सिंह के बलिदान दिवस (23 मार्च) और डा. भीम राव अम्बेडकर के जन्म दिवस (14 अप्रैल) को समर्पित कार्यक्रम 20 मार्च से 20 अप्रैल तक सघन तरीके से चलाने का निर्णय लिया गया। इस अवसर पर ”संविधान की प्रस्तावना लागू करो“ और ”वर्गविहीन और जातिविहीन समाज का निर्माण और डा. अम्बेडकर“ विषय पर विचारगोष्ठियां आयोजित की जायेंगी। पूरे माह सभायें, नुक्कड़ सभायें, पर्चा वितरण करके कम्युनिस्टों और वामपंथी दलों को बदनाम करने की संघ परिवार की साजिश को बेनकाब किया जायेगा और अभिव्यक्ति की आजादी पर हमलों का जवाब दिया जायेगा। जिला कमेटियों से अनुरोध किया गया है कि वे इन आयोजनों में वामपंथी दलों के अतिरिक्त अन्य जनवादी ताकतों को जोड़ने का भी प्रयास करें।
रेल बजट, आम बजट और सरकार की नीतियों को पूरी तरह से कारपोरेट घरानों के अनुकूल और देश के बहुमत किसानों, मजदूरों, दलितों और अल्पसंख्यकों के प्रतिकूल बताते हुए पार्टी ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया है कि विजय माल्या जैसे जनता के धन को लूटने वाले लोग देश छोड़ कर भाग जाते हैं और सरकार कुछ भी नहीं कर पाती है। भाकपा ने विजय माल्या को जल्दी से जल्दी देश में वापस लाने, उनकी समस्त परिसम्पत्तियों को जब्त करने और उन पर अभियोग चलाने की मांग की है तथा चेतावनी दी है कि धनिक वर्ग को लाभ पहुंचाने के लिए गरीबों के हितों पर कुल्हाड़ा चलाने से सरकार बाज आये। भाकपा इस दिशा में शीघ्र ही एक बड़े आन्दोलन की रूपरेखा बनाने जा रही है।
भाकपा की राज्य कौंसिल बैठक में भावी विधान सभा चुनावों की तैयारियों पर भी चर्चा की गयी और जिलों को निर्देश दिया गया कि वे लड़ने योग्य सीटों को तय करके सूची राज्य केन्द्र को शीघ्र से शीघ्र प्रेषित करें।
बैठक में 1 मई से 10 मई तक जनता से धन संग्रह अभियान चलाने का निर्णय भी लिया गया।
बैठक में राजनैतिक और कार्यों सम्बंधी रिपोर्ट राज्य सचिव डा. गिरीश ने प्रस्तुत की जिस पर 35 साथियों ने चर्चा में भाग लिया।

Thursday, February 25, 2016

भाजपा और संघ की फासिस्टी कार्यवाहियों के खिलाफ वामदल एकजुट होरहे हैं

वामदलों के लोकतंत्र बचाओ अभियान को व्यापक समर्थन उत्तर प्रदेश में ज्यादातर जिलों में बड़ी संख्या में सडकों पर उतरे वामपंथी कार्यकर्ता इलाहाबाद में आन्दोलनकारी वाम नेताओं पर किया गया कातिलाना हमला दोषी हमलावरों को गिरफ्तार करने की मांग लखनऊ 25 फरवरी: वामपंथी दलों के राष्ट्रीय आह्वान पर उत्तर प्रदेश में आयोजित लोकतंत्र बचाओ अभियान को जनता का व्यापक समर्थन मिला है. प्रदेश के ज्यादातर जिलों में मार्च निकाले गए अथवा धरने प्रदर्शन आयोजित किये गए. वाम दलों ने इस सफलता के लिए प्रदेश की जनता को बधाई दी है. ज्ञातव्य हो कि छः वामदलों ने 23 से 25 फरवरी तक पूरे देश में लोकतांत्रिक अधिकारों पर किये जारहे हमलों के खिलाफ, रोहित वेमुला को न्याय दिलाने, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के कन्हैया कुमार को रिहा करने तथा उन पर एवं कई निर्दोष छात्रों पर लगे फर्जी मुकदमे वापस लेने आदि मांगों को लेकर तीन दिवसीय अभियान चलाने का निर्णय लिया था. अभियान के दौरान आज वामदलों के शान्तिपूर्ण तरीके से आन्दोलन कर रहे कार्यकर्ताओं पर कचहरी के अन्दर कातिलाना हमला किया गया. हमले में दर्जनों कार्यकर्ता हताहत हुए हैं. हमला करने वालों में भाजपा कार्यकर्ता तथा उनके पिट्ठू वकील थे. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव डा. गिरीश एवं भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) के राज्य सचिव मंडल सदस्य प्रेमनाथ राय ने यहाँ जारी एक संयुक्त प्रेस बयान में इलाहाबाद की घटना की घोर निंदा करते हुए दोषियों को गिरफ्तार करने की मांग की है. डा. गिरीश

Friday, February 12, 2016

कन्हैया कुमार को तत्काल रिहा किया जाये : भाकपा

लखनऊ-12, फरवरी—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी( JNU) छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी की कडे शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने कन्हैया की तत्काल बिना शर्त रिहाई तथा जे.एन.यू. कैम्पस से पुलिस हठाने की मांग की है. भाकपा ने लखनऊ में एसएफआई कार्यालय पर एबीवीपी कार्यकर्ताओं द्वारा किये गये हमले और तोड फोड की भी निंदा की है तथा इस घटना के दोषियों को गिरफ्तार करने की मांग की है. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि गत दिन जेएनयू में हुये कार्यक्रम के दौरान कुछ तत्वों ने अवांछित नारे लगाये थे जिनकी पहचान कर उनके खिलाफ कार्यवाही की जाने की जरूरत थी. कन्हैया ने कल रात ही टी. वी. चैनल्स पर साफ कर दिया था कि इस तरह के नारे लगाने वालों से उनका कोई संबंध नहीं और उन्होने ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्यवाही की मांग भी की थी. कन्हैया कुमार वामपंथी छात्र संगठन आल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन से संबधित हैं जिसकी आज़ादी के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका रही है और सदैव ही यह संगठन छात्र एवं शैक्षिक हितों के लिये काम करता रहा है. गत दिनों इस संगठन ने अन्य छात्र संगठनों के साथ मिल कर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग पर तथा हैदराबाद के दलित छात्र रोहित वेमुला की हत्या के खिलाफ व्यापक आंदोलन चलाया है, जिससे केंद्र सरकार बौखलाई हुयी है. केंद्र सरकार और उसका जनक संघ परिवार वामपंथी, दलित, अल्पसंख्यक और अन्य मेहनतकश तबकों को तवाह कर कार्पोरेट्स के हितों को साधने में लगे है और उसके लिये वे प्रतिरोध की आवाज को दबाना चाहते हैं. इसीलिये पहले दाभोलकर, पंसारे और कालबुर्गी की हत्यायें की गयीं और अब जेऐनयू, ए.एम.यू., लखनऊ, हैदराबाद और इलाहाबाद जैसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्त्तताको निशाना बनाया जारहा है. जो सरकार आतंकवाद से निपटने में पूरी तरह विफल रही है वह ऐसे लोगों को देशद्रोही करार देने पर उतारु है जो आतंकवाद और सांप्रदायिकता से जूझते रहे हैं. वामपंथ पर यह हमला इस बात का संकेत दे रहा है कि फासीवाद पैर पसारने को मचल रहा है. भाकपा सभी जनवादी ताकतों से अपील करती है कि वे केंद्र सरकार के इन तानाशाहीपूर्ण कदमों के खिलाफ कडा प्रतिवाद दर्ज करायें. डा. गिरीश, राज्य सचिव

Sunday, February 7, 2016

केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ भाकपा का जिला केन्दों धरना प्रदर्शन 11 फरबरी को

लखनऊ- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने अपनी समस्त जिला इकाइयों को निर्देशित किया है कि वे केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार के जन विरोधी कार्यों से जनता को राहत दिलाने को 11 फरबरी को जिला स्तर पर आन्दोलन करें. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि केन्द्र की मोदी सरकार बेशर्मी के साथ आर्थिक नव उदारवाद के एजेंडे पर चल रही है, इसके चलते जनता की समस्यायें लगातार बढ़ रही हैं. अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल के दामों में भारी गिरावट के बावजूद पेट्रोल डीजल के दाम काफी ऊँचे स्तर पर हैं, राशन खाद गैस आदि सभी पर सब्सिडी ख़त्म कर दी गयी है, महंगाई सातवें आसमान पर है, रेल आदि सभी सरकारी उपक्रमों में जनता को मिली सुविधायें छीनी जारही हैं तथा सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न का एजेंडा लगातार जारी है. उत्तर प्रदेश सरकार के विकास के दावों का खोखलापन तो इसीसे जाहिर होजाता है कि मौसम की मार से पीड़ित किसानों को कोई राहत नहीं मिल पा रही और बुंदेलखंड सहित प्रदेश के तमाम हिस्सों में किसान आत्महत्यायें कर रहे हैं. गन्ना किसानों का चीनी मिलों पर रु. ६५० करोड़ बकाया है, लागतों में भारी वृध्दि के बावजूद तीन वर्षों से गन्ने का समर्थन मूल्य बढ़ाया नहीं गया, किसान रु.350/- प्रति कुंतल की मांग कर रहे हैं, बिजली विभाग बसूली के नाम पर उपभोक्ताओं का उत्पीड़न कर रहा है- बिजली के कनेक्शन काटे जारहे हैं, बकायेदारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जारहीं हैं और रिश्वतें ली जारही हैं, बिजली मिल नहीं पारही, गरीबी की सीमा के नीचे वालों के राशन में कटौती कर दीगयी है, आये दिन महिलाओं और कमजोरों के उत्पीडन की बारदातें होरही हैं, क़ानून- व्यवस्था पंचर होगयी है, दलितों की जमीनों को हडपने का रास्ता खोल दिया गया है. आतंकवाद के नाम पर पूर्व में गिरफ्तार लोगों को अदालतें रिहा कर रही हैं, मगर अब तमाम लोगों को आतंकी बता कर गिरफ्तार किया जारहा है. उन्हें अदालतों द्वारा दोषी ठहराने से पहले ही आतंकवादी के रूप में प्रचारित किया जा रहा है. इन्हीं तमाम जनता से जुड़े सवालों पर भाकपा ने 11 फरबरी को जिलों में धरने, प्रदर्शन अथवा आम सभायें आयोजित करने का निश्चय किया है. जनता की इन समस्याओं के निराकरण के लिए प्रधानमंत्री एवं मुख्यमंत्री के लिए ज्ञापन जिलाधिकारियों के माध्यम से भेजे जायेंगे. डा.गिरीश

Monday, January 25, 2016

संपूर्ण सत्ता पाते ही संघ का फासिस्टी चेहरा उजागर

हाल ही में लखनऊ की दो घटनायें काबिले गौर हैं- प्रथम- अपनी लखनऊ यात्रा के दौरान श्री मोदी जब हजरतगंज से गुजर रहे थे तो हैदराबाद के दलित छात्र रोहित वेमुला की बलात आत्महत्या के विरोध में एक वामपंथी छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाये. यह देखते ही वहां मौजूद भगवा ब्रिगेड के लोग बौखला गये और जनतांत्रिक तरीके से विरोध जता रहे छात्रों पर हमला बोलने को दौड़ पड़े. समाचार पत्रों के मुताबिक यदि पुलिस ने विरोध जताने वाले छात्रों को खदेड़ न दिया होता तो भगवा ब्रिगेड उनको सबक सिखा देती. दूसरी- एक बारबर के बेटे को आतंकवादियों से कथित संबंध बता कर जब गिरफ्तार किया गया तो भीड़ ने उसके पिता की दुकान पर हमला बोल दिया और उसमें तोड़-फोड़ की. तोड़-फोड़ करने वालों को खदेड़ने के लिये पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी. ( बंबई में भी रोहित की मौत का विरोध कर रहे दलित छात्रों को संघ की शाखा वालों ने लाठी-डंडों से पीट पीट कर घायल कर दिया). ये दोनों घटनायें कई सवाल खड़े करती हैं- क्या लोकतंत्र में काले झंडे दिखाने वालों से अब सत्तापक्ष कानून हाथ में लेकर खुद ही निपटेगा? इससे जो अराजकता और तानाशाही का बीजारोपण होगा वह हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली को ही ले डूबेगा. लंबे समय तक विपक्ष में रहने वाला संघ गिरोह आये दिन काले झंडे दिखाने का काम करता रहा तब उस पर तो किसी दल के कार्यकर्ताओं ने हमले नहीं किये. इससे साबित होता है कि लोकतांत्रिक तरीकों से सत्ता में आया संघ गिरोह सत्ता में आते ही लोकतांत्रिक परंपराओं को ही तहस- नहस करने पर आमादा है. अब जरा दूसरी घटना पर गौर करें. किसी को किसी आरोप में गिरफ्तार करने का मतलब यह तो नहीं कि वह अपराधी सिध्द होगया. यह तो न्याय के घोषित सिध्दांतों के विरुध्द होगा. यह भी जग जाहिर कि राज सत्तायें अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये तमाम निर्दोष लोगों को झूठे आरोप लगा कर गिरफ्तार करती रहीं हैं और बाद में अदालतों ने उन्हें निर्दोष करार दिया है. बीस माह के शासनकाल में हर मोर्चे पर विफल रही भगवा सरकार भी इस तरह की गिरफ्तारियां करके समस्याओं से ध्यान हठाने की कोशिश कर रही है, तमाम राजनीतिविदों ने ऐसी आशंका जताई हैं. फिर किसी को भी भीड़ इकट्ठी कर तोड़ फोड़ करने और कानून हाथ में लेने का अधिकार किसने दे दिया? यहां यह भी उल्लेखनीय कि देश में आये दिन आतंकी हमले होते रहते हैं लेकिन कहीं भी कभी भी ऐसा देखने को नहीं मिला कि भीड़ आतंकवादियों से मोर्चा लेने निकल पड़ी हो. नहीं कभी संघ शाखा के लठैत आतंकवादियों से दो दो हाथ करने निकले. ये अपने देश के दलितों, अल्पसंख्यकों अथवा उनके पक्ष में आवाज उठाने वालों पर ही शूरमागीरी दिखाते रहते हैं. क्या यह इसलिये नहीं कि संघ गिरोह ने समाज में सांप्रदायिकता का जहर घोल रखा है. असहिष्णुता का मुद्दा उठाने वालों को दिन रात कोसने वाला संघ गिरोह बताने का कष्ट करेगा क्या कि सहिष्णुता के वातावरण में किसी की गिरफ्तारी मात्र पर उसके घर या प्रतिष्ठान पर हमला कौन करेगा? जब तक कि भीड़ को उकसाया न जाये. और इस उकसावे का काम संघ गिरोह के अलाबा कौन कर सकता है? बंबई में तो संघियों ने खुले आम हमला बोला. लखनऊ और बंबई की घटनायें इस ओर इशारा करती हैं कि दलितों कमजोरों के पक्ष में आवाज उठाने वालों पर हमले और किसी पर आरोप लगते ही भीड़ को उकसा कर तोड़ फोड़ कराने की वारदातें हमारे लोकतंत्र के लिये गंभीर खतरा हैं. 67 वें गणतंत्र दिवस पर जागो भारतवासियो! डा. गिरीश

Thursday, December 31, 2015

साम्यवाद ही क्यों? विचार गोष्ठी आयोजित

हाथरस- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना के 90 गौरवशाली साल पूरे होने के उपलक्ष्य में एक भव्य समारोह जनपद- हाथरस के कस्बा- मेंडू में आयोजित किया गया. गीत और संगीत के कार्यक्रमों के अतिरिक्त वहां एक विचार गोष्ठी का आयोजन भी किया गया. गोष्ठी का विषय था- साम्यवाद ही क्यों? गोष्ठी को संबोधित करते हुये भाकपा उत्तर प्रदेश के सचिव डा. गिरीश ने कहा कि देश को अंग्रेजों की दासता से मुक्त कराने और आजाद भारत में एक समानता, भाईचारे पर आधारित और सभी प्रकार के शोषण से मुक्त साम्यवादी समाज की स्थापना के उद्देश्य से भाकपा का गठन देश के उन क्रांतिकरियों ने किया था जो रुस की समाजवादी क्रांति से प्रेरित थे तथा मजदूरों- किसानों को पूंजीपतियों की दासता से मुक्त कराना चाहते थे. भाकपा की स्थापना से पहले और उसके बाद मार्क्स, एंगेल्स और लेनिन के विचारों से प्रेरित इन क्रांतिकारियों ने कदम ब कदम अनेक कदम उठाये जिनके चलते देश को आज़ाद कराने में भारी मदद मिली. लेकिन साम्यवादी समाज की रचना का काम आज भी शेष है. सबका साथ और सबका विकास की बात करने वाले आज के शासक अल्पसंख्यक समुदाय को कदम कदम पर हानि पहुंचा रहे हैं और गरीब तथा आम आदमी की कीमत पर कार्पोरेट घरानों को लाभ पहुंचा रहे हैं. डा. गिरीश ने कहा कि आजादी के बाद शासक पूंजीपति वर्ग की पार्टियों – कांग्रेस, भाजपा, क्षेत्रीय और जातिवादी दलों ने मेहनतकशों को लुभावने नारे दे कर और उन्हें जाति, क्षेत्र और सांप्रदायिक आधारों पर बांट कर समाजवाद और साम्यवाद के लक्ष्य को भारी हानि पहुंचाई है. वहीं पार्टी में विभाजन करने वालों ने भी इस पावन उद्देश्य को कम हानि नहीं पहुंचाई. महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि आज विभाजन करने वाली पार्टियां उसी नीति और कार्यनीति पर चल रहे हैं जिनकी कि आलोचना करके उन्होने अलग पार्टियां बनायीं थीं. उन्होने कहा कि आजादी के बाद के इन 67 सालों में जनता ने हर पूंजीवादी दल की सत्ता का स्वाद चख लिया है. आज इस निष्कर्ष पर आसानी से पहुंचा जा सकता है कि इस पूरे कालखंड में किसान कामगार और अन्य मेहनतकश तवाह हुये हैं तथा पूंजीपति, माफिया और राजनेता मालामाल हुये हैं. हमें इन लुटे पिटे तबकों की चेतना को जगाना होगा. इसके लिये भारी मेहनत करनी होगी. लोगों को बताना होगा कि अब उन्हें पूंजीवादी दलों के मायाजाल से बाहर आना होगा. हमें अब सत्ता में पहुंचने का लक्ष्य निर्धारित करना होगा और संकल्प लेना होगा कि हम भाकपा की 100 वीं वर्षगांठ तक सत्ता शिखर तक अवश्य पहुंचेंगे. इसके लिये भाकपा को अपने संगठन की चूलें तो कसनी ही होगी तमाम संकीर्णताओं के प्रति वैचारिक विमर्श चलाते हुये वामपंथी एकता को भी मजबूत करना होगा. वामपंथ को मजबूत बना कर ही वाम जनवादी एकता का रास्ता हमवार होता है. बिना वामपंथ को मजबूत किये जनवादी एकता की बात बेमानी साबित होगी. भाकपा राज्य कार्यकारिणी के सदस्य का. गफ्फार अब्बास ने कहा कि वोट हमारा राज तुम्हारा का खेल अब नहीं चलने दिया जायेगा. हम मेहनतकश 100 में नब्बे हैं जिनका हित केवल साम्य्वाद में ही संभव है. समाजवाद और फिर साम्यवाद ही हम सब को सम्रध्द और खुशहाल बना सकता है. गोष्ठी में डी.एस. छोंकर, बाबूसिंह थंबार, चरनसिंह बघेल, जगदीश आर्य, सत्यपाल रावल, द्रुगपाल सिंह, नूर मुहम्मद, आर. डी. आर्य, नैपाल सिंह( बी. डी. सी.), संजय खान, पप्पेंद्र कुमार, राजाराम कुशवाहा, आबिद अहमद एवं महेंद्र सिंह ने भी विचार व्यक्त किये. डा. गिरीश

Monday, December 28, 2015

जिला पंचायत के अध्यक्षों और ब्लाक प्रमुखों के चुनावों में धींगामुश्ती रोके जाने की भाकपा ने मांग की

लखनऊ- 28 दिसंबर- 2015 : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश राज्य मंत्रि परिषद ने प्रदेश में जिला पंचायत और ब्लाक पंचायत के अध्यक्ष/ प्रमुखों के होने जारहे चुनावों में चल रही धींगामुश्ती, छीन-झपट और बल प्रयोग पर कडी आपत्ति जताते हुये इसे लोकतंत्र के लिये बहुत ही घातक बताया है. भाकपा ने इन कारगुजारियों पर अंकुश लगाने तथा ‘फ्री एंड फेयर’ चुनाव कराये जाने की मांग की है. उत्तर प्रदेश के महामहिम राज्यपाल एवं मुख्य निर्वाचन अधिकारी को लिखे गये पत्र में भाकपा के राज्य साचिव डा. गिरीश ने कहा है कि हाल ही में प्रदेश की जनता द्वारा जिला पंचायत एवं ब्लाक समितियों के सदस्यों का निर्वाचन इस मकसद से किया है कि वे अपने निकायों का ऐसा मुखिया चुनेंगे जो सच्चाई और ईमानदारी के साथ विकास कार्यों को अंजाम देगा. लेकिन इनके निर्वाचित होते ही इनकी खरीद फरोक्त के लिये बोली लगना शुरु होगयी और धन बल बाहुबल और सत्ता बल के जरिये इनको अपने कब्जे में करने की होड लग गयी. वैसे तो प्रदेश की तीनों प्रमुख पार्टियां- सपा, भाजपा और बसपा इस अनैतिक और लोकतंत्र विरोधी कारगुजारी में लिप्त हैं, लेकिन सत्ता में होने के नाते सपा इस काम में औरों से आगे है. सपा प्रवक्ता ने तो बयान दिया है कि अध्यक्ष पद के प्रत्याशी तय करने में उनकी ‘ताकत और दबंगई’ का ध्यान रखा गया है. अपने पत्र में भाकपा राज्य सचिव ने इस बात का भी उल्लेख किया है कि इन दोनों निकायों में विकास के लिये भारी धनराशि आबंटित होकर आती है. माफियातत्त्व इस धनराशि को हडप कर जाना चाहते हैं. अतएव वे सक्षम राजनैतिक दलों के प्रत्याशी बन कर चुनाव लड रहे हैं. राज नेता और राजनैतिक दल भी इस लूट खसोट के भागीदार बनना चाहते हैं. इससे जनता के धन के नेताओं की झोली में जाने का रास्ता तो खुला ही है लोकतंत्र और पंचायती राज सिस्टम भी गहरे संकट में है. इसको बचाने का प्रयास फौरन किया जाना चाहिये. डा. गिरीश ने दोनों संवैधानिक शख्सियतों से इस मामले में तत्काल ठोस कदम उठाने की मांग की है. डा. गिरीश, राज्य सचिव

Monday, December 14, 2015

नरेंद्र मोदी और शिंजो आबे की गंगा आरती में भागीदारी राजनैतिक उद्देश्यों से प्रेरित.

गत दिनों एक हिदी दैनिक में प्रकाशित इतिहासकार श्री रामचंद्र गुहा के एक लेख का उपसंहार कुछ इस प्रकार हुआ है – भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर ने कहा है कि “बहुलता और सहिष्णुता का माहौल सतत आर्थिक विकास के लिये अनिवार्य है.” ऐसा नहीं लगता कि प्रधानमंत्री मोदी इस बात से सहमत हैं. वह एक साथ आर्थिक आधुनिकतावादी और सांस्कृतिक प्रतिक्रियावादी, दोनों बने रहना चाहते हैं. यह दो घोडौं की सवारी है, जिनमें से एक आगे जा रहा है और दूसरा पीछे. जापान के प्रधानमंत्री शिंजो अबे की यात्रा का संपूर्ण सार उपर्युक्त शब्दों पूरी तरह अभिव्यक्त है. इस यात्रा के मौके पर मोदी ने जापान के साथ जहाँ कई आर्थिक समझौते किये वहीं अपने चुनाव क्षेत्र वाराणसी जाकर शिंजो अबे के साथ पूरे एक घंटे तक गंगा आरती में भाग लिया. दोनों की तन्मयता देखते ही बनती थी. यहाँ दोनों प्रधानमंत्रियों द्वारा किये गये आर्थिक/ व्यापारिक समझौतों पर कोई टिप्पणी करना व्यर्थ है. आर्थिक नव उदारवाद और कार्पोरेट हितों के लिये समर्पित भारत सरकार के मुखिया से यह सब अपेक्षित ही है. लेकिन दोनों जनतंत्रों के मुखियाओं का गंगा आरती में पूरा का पूरा एक घंटे बिताना और एक अनापेक्षित तन्मयता का प्रदर्शन करना कई सवाल खडे करता है. धर्म और आस्था एक बिल्कुल निजी मामला है. किसी भी उच्च पदासीन व्यक्ति अथवा जनसाधारण को अपने धर्म और उसके प्रति उसकी आस्था को पाबंद नहीं किया जा सकता. लेकिन धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देशों के दो दो राष्ट्राध्यक्ष यदि गंगा आरती जैसे धार्मिक आयोजन में भाग लेंगे तो उनके इस कृत्य की नुक्ताचीनी अवश्य ही होगी. श्री मोदी का लक्ष्य स्पष्ट है. वे आर्थिक नव उदारवाद के एजेंडे पर सरपट दौड्ते हुये भी हिंदुत्व के अपने एजेंडे से हठना नहीं चाहते, यही वजह है वे दादरी जैसी घृणित घटनाओं पर मौन साधे रहे, असहिष्णुता के सवाल पर भी खामोश बने रहे, योग जैसी लोकप्रिय विधा को उन्होने हिंदुत्व की चाशनी में लपेट कर पेश करने में कोई कोर कसर नहीं रखी थी, आये दिन अपनी पार्टी के नेताओं के विवादास्पद बयानों पर उन्होंने कभी लगाम नहीं लगाई और अब गंगा आरती में भाग लेकर अपनी धर्मपरायण और हिंदूपंथी छवि को पेश करने में कामयाब रहे. आरती के समय जिस तन्मयता का प्रदर्शन उन्होंने किया यदि ऐसी ही तन्मयता उन्होने गुजरात के सांप्रदायिक दंगों के दौरान दिखाई होती तो बडे खून खराबे को रोका जा सकता था. शीर्षस्थ पद पर बैठे किसी व्यक्ति द्वारा किसी धार्मिक क्रिया में भाग लेने का प्रभाव तुरत फुरत होता है. आज ही हरिद्वार की गन्गा समिति ने 9 स्थानों पर आरती करने का और उसे भव्यता प्रदान करने का फैसला किया है. कल वारणसी में भी यही कहानी दोहराई जा सकती है. मोदी हो या शिंजे, कोई भी शासक यही चाहता भी है. धार्मिक कट्टरता बडे और लोग उसी में उलझ कर अपने रोजी रोटी के सवालों को तरजीह न दें, शासक वर्ग ऐसा ही चाहता है. इस आरती को भव्यता प्रदान करने, इसमें दोनों नेताओं की भागीदारी की व्यवस्थायें करने में जो भारी राजस्व का अपव्यय हुआ उससे वाराणसी जनपद के समस्त सरकारी अस्पतालों की एक सप्ताह की दवा खरीदी जा सकती थी. सुरक्षा इंतजामों या यात्रा पर हुये व्यय को जोड दिया जाये तो इस धनराशि से एक माह की दवायें वाराणसी के अस्पतालों को दी जा सकती थीं. पर मोदी को तो अपने हिंदुत्त्व के एजेंडे को जिंदा रखने और अपने वोट बैंक को साधे रखने की फिक्र है. इसके लिये वे लोकतांत्रिक परंपराओं को तहस नहस करने से भी नहीं चूक रहे. दास व्यवस्था, सामंती समाज तथा पूंजीवादी व्यवस्था सभी में बहुमत पर अल्पमत का शासन रहता है. समस्त संसाधनों पर अल्पमत समाज का कब्जा रहता है और बहुमत समाज उनके हितों की प्रतिपूर्ति का औजार बन कर रह जाता है. और इस तरह वह घोर अभावों में कष्टमय जीवन बिताने को मजबूर होता है. यह अभाव और कष्ट बहुमत समाज में अल्पमत समाज के प्रति आक्रोश और विद्रोह को जन्म देता है. शासक वर्ग इस आक्रोश और विद्रोह की ज्वाला को शांत करने को तमाम हथकंडे अपनाता है. धर्म और आस्था उनमें सबसे कारगर औजार हैं. मोदी और शिंजे दोनों शासक वर्ग के चतुर सिपहसालार हैं. अतएव एक ओर वे दोनों आर्थिक आधुनिकतावाद का अनुशरण कर रहे हैं, वहीं सांस्कृतिक कट्टरता को भी परवान चढाना चाहते हैं. वाराणसी में गंगा आरती में उनकी भागीदारी इसी उद्देश्य के लिये है. डा. गिरीश.

Sunday, November 8, 2015

असहिष्णुता, घृणा और हिंसा की राजनीति के खिलाफ आवाज बुलन्द करने का समय

हिटलर के समकालीन प्रसिद्ध जर्मन कवि मार्टिन नीमोलर की यह पंक्तियां आज की भारतीय राजनीति में बहुत साम्यिक हो गई हैं:
पहले वे कम्युनिस्टों के लिए आये
मैं चुप था, क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था
फिर वे ट्रेड यूनियनिस्टों के लिए आये
मैं चुप था, क्योंकि मैं ट्रेड यूनियनिस्ट नहीं था
फिर वे यहूदियों के लिए आये
मैं चुप था, क्योंकि मैं यहूदी नहीं था
अंत में वे मेरे लिए आये
और मेरे लिए बोलने वाला कोई नहीं था
मोदी के सत्ता में आने के बाद संघ और उसके तमाम पुराने और नए पैदा हो गये सहयोगी संगठन जिस तरह से देश में असहिष्णुता, घृणा और हिंसा की राजनीति को फैला रहे हैं, वह भारत जैसे प्राचीन समय से बहुलवादी रहे देश, उसकी साझा संस्कृति, उसकी सम्प्रभुता, उसके संविधान सबके लिए खतरा पैदा कर रहे हैं। इन ताकतों द्वारा सबसे पहले दाभोलकर की हत्या, फिर का. गोविन्द पानसरे की हत्या, फिर कलबुर्गी की हत्या कर दी गईं और सत्ता शिखरों से इनके हत्यारों को शह प्राप्त थी। उसके बाद जिस तरह बकरीद के ठीक बाद गौमांस घर पर रखने का आरोप एक मंदिर के लाउडस्पीकर से लगाकर साजिशन एक निरीह मुस्लिम अखलाक की हत्या दादरी के पास कर दी गई, तो शांतिप्रमियों के लिए एक जबरदस्त झटका रही। ऐसे तत्वों की दुस्साहस इतना बढ़ गया है कि इन लोगों ने संघ के ही एक पुराने कार्यकर्ता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई के सहयोगी रहे कुलकर्णी के भी चेहरे पर कालिख पोत दी।
इस असहिष्णुता, घृणा और हिंसा की संघी राजनीति के प्रतिरोध की शुरूआत देश में लेखकों ने साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस कर एक आवाज उठाई। उस आवाज के समर्थन में वैज्ञानिक, फिल्मकारों, इतिहासकार, डाक्टर, पर्यावरणविद्, पत्रकारों, पूर्व सैनिक आदि जनता के तमाम और तबके भी उठ खड़े होने लगे और पुरस्कार वापसी में पद्म पुरस्कार भी वापस किये जाने लगे। यह सिलसिला चल ही रहा था कि कल बिहार की जनता भी उठ खड़ी हुई और उसने मोदी-शाह की जोड़ी को जिस प्रकार जवाब दिया, वह भारतीय राजनीति में जन-मानस की बहुलतावादी प्रवृत्ति का द्योतक है।
बिहार चुनावों से पृथकतावादी यह तत्व कोई सबक लेने के बजाय आने वाले वक्त में और आक्रामक होंगे। लेखकों, कवियों, साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, डाक्टरों, पर्यावरणविदों, पत्रकारों तथा पूर्व सैनिकों आदि तमाम तबकों ने अपनी आवाज को उठाकर अपना दायित्व पूरा कर दिया है, इन आवाजों को बुलन्दियों तक ले जाने का काम कौन करें, यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने है।
जिस प्रकार सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल संघ से गलबहियां करते रहे हैं, यह साफ हो चुका है कि वे तो संघ और उसके सहयोगी संगठनों की आवाजों को ही बुलन्द करने में विश्वास करते हैं। दादरी प्रकरण में जिस तरह सपा सरकार ने भाजपा विधायक संगीत सोम को हिंसा के बाद उसी मंदिर पर जाकर हिंसा को और भड़काने की अनुमति दी और शान्तिकामी ताकतों को वहां जाने से रोका, उससे यह बात साफ हो चुकी है।
अस्तु, अंततः वे वामपंथी ही हैं जिन पर लेखकों, कवियों, साहित्यकारों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों, डाक्टरों, पर्यावरणविदों, पत्रकारों तथा पूर्व सैनिकों आदि तमाम तबकों द्वारा असहिष्णुता, घृणा और हिंसा की राजनीति के खिलाफ उठाई गई आवाज को बुलन्द करने का दायित्व आता है। आओ साथियों आगे बढ़े और इस गुरूतर दायित्व को पूरा करने के लिए जनता के वृहत तबकों को लामबंद करने का काम शुरू करें।

Saturday, November 7, 2015

सांप्रदायिकता, असहिष्णुता और हिंसा की राजनीति के खिलाफ अभियान चलायेगी भाकपा

लखनऊ- 7 नवंबर - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य काउंसिल की दो दिवसीय बैठक आज यहाँ संपन्न होगयी. बैठक में आन्दोलन/ अभियान संबंधी कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये गए हैं. बैठक के निष्कर्षों की जानकारी देते हुये राज्य सचिव डा.गिरीश ने बताया कि राज्य काउंसिल ने केन्द्र सरकार द्वारा आज ही पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद कर में फिर से वृध्दि करने एवं सभी सेवाओं पर सेस लगाने के फैसलों को जनविरोधी बताते हुए इसकी कड़े शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने इस संबंध में पारित प्रस्ताव में कहा कि मोदी सरकार को आम जनता की कोई फ़िक्र नहीं है. बिहार के चुनाव समाप्त होते ही उसने जनता के ऊपर नए करों का बोझ लाद दिया. इससे महंगाई की मार से पहले से ही हाल- बेहाल जनता और भी बेहाल हो जायेगी. भाकपा ने जनहित में इन वृध्दियों को तत्काल रद्द करने की मांग की है और इस सवाल को जनता के बीच लेजाने का निश्चय किया है. भाकपा ने रूढ़वादिता, असहिष्णुता, सांप्रदायिकता एवं हिंसा की राजनीति के खिलाफ चरणबध्द अभियान छेड़ने का निश्चय किया है. अभियान के पहले चरण के रूप में 24 नवंबर को- "रूढ़वादिता, असहिष्णुता और हिंसा की राजनीति" विषय पर प्रत्येक जनपद में विचार गोष्ठियां आयोजित करने का निर्णय लिया है. दूसरे चरण में डा. भीमराव अंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस (6 दिसंबर ) को अथवा उसकी पूर्व संध्या पर "सदभाव एवं संविधान की रक्षा" के उद्देश्य से गोष्ठियां, सभाएं अथवा अन्य आयोजन किये जायेंगे. तीसरे चरण में इन मुद्दों पर क्षेत्रीय रैलियाँ आयोजित की जायेंगी. हर कार्यक्रम में समाज के प्रबुध्द और सहिष्णु तबकों एवं शख्सियतों को शामिल किया जायेगा. इन अभियानों की प्रासंगिकता को जतलाते हुये राज्य काउंसिल द्वारा पारित रिपोर्ट में कहा गया है कि केन्द्र में मोदी सरकार के पदारूढ़ होने के बाद से आर.एस.एस. और दूसरी हिन्दुत्ववादी सांप्रदायिक शक्तियां और अधिक हमलावर होगयीं हैं. वे पूरी तरह निरंकुश होकर सेक्युलर, सहिष्णु एवं उदार शक्तियों के खिलाफ जहर उगल रही हैं और रूढ़वादिता के खिलाफ संघर्ष करने वाले व्यक्तियों की हत्यायें कर रही हैं. दादरी में अखलाक, कन्नड़ लेखक कलबुर्गी, कम्युनिस्ट नेता का.गोविन्द पानसरे तथा नरेन्द्र दाभोलकर की हत्यायें संघ द्वारा पोषित और केन्द्र सरकार द्वारा संरक्षित घ्रणित विचारों की देन हैं. मुस्लिम अल्पसंख्यक इनके खास निशाने पर है. अपनी इन निर्लज्ज करतूतों को वे राष्ट्रवाद का चोला पहना रही हैं. प्रधानमन्त्री ने इन हरकतों पर चुप्पी साध रखी है और उनके मंत्रिमंडल सहयोगी व प्रमुख भाजपाई निरंतर विषवमन कर समाज को बाँट रहे हैं और हिंसा की जघन्य वारदातों को वे स्वाभाविक आक्रोश की देन बता कर अपने पापों पर पर्दा डाल रहे हैं. देश में बढ़ती सांप्रदायिक हिंसा और असहिष्णुता के खिलाफ साहित्यकारों, कलाकारों, फिल्मी हस्तियों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों और अन्य प्रबुध्द जनों ने अपनी आवाज उठायी है और उन्हें मिले शानदार पुरुस्कारों को वापस किया है. यह क्रम लगातार जारी है. भाकपा उनके इस संघर्ष में पूरी शिद्दत से उनके साथ है. अब संघ गिरोह ने कम्युनिस्टों और वामपंथियों के खिलाफ अनर्गल प्रलाप शुरू कर दिया है जो उनकी खीझ और बौखलाहट का परिचायक है. हम इन फासिस्ट कारगुजारियों के खिलाफ सदैव संघर्षरत रहे हैं और आगे भी रहेंगे, भाकपा ने संकल्प व्यक्त किया है. भाकपा ने इस बैठक में जिला एवं क्षेत्र पंचायत चुनावों कि समीक्षा की . भाकपा के पांच सदस्य और सात समर्थित प्रत्याशी जिला पंचायत में विजयी हुए हैं जबकि पिछली बार केवल एक प्रत्याशी ही जीता था. लगभग पचास बी. डी. सी. सदस्य भी विजयी हुये हैं. जाती, धन और बाहुबल के इस दौर में भाकपा प्रत्याशी बेहद कम संसाधनों और शुचिता के साथ चुनाव लड़े थे. निष्कर्ष है कि भाकपा अपनी चुनावी राजनीति को पुनः संगठित कर रही है. अब ग्राम प्रधान के चुनाव भी अधिकाधिक संख्या में लड़ने का निर्णय लिया गया है. डा. गिरीश, राज्य सचिव

Friday, October 16, 2015

हिदू मुस्लिम त्योहारों पर कडी चौकसी बरती जाये: भाकपा

दशहरा- मौहर्रम के मद्दे नजर कानून व्यवस्था कडी करे सरकार: भाकपा लखनऊ- 16-10- 15. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने राज्य सरकार को आगाह किया है कि वह पूर्व के अनुभवों, प्रदेश के विषाक्त वातावरण और दशहरा, दुर्गा पूजा तथा मौहर्रम जैसे त्योहारों को देखते हुये प्रदेश को किसी अनहोनी से बचाने को कडे कदम उठाये. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि गत कई वर्षों से यह देखने में आरहा कि दशहरा, दुर्गा पूजा और मौहर्रम जैसे त्योहारों से पहले सांप्रदायिक और दूसरे अवांछनीय तत्व धार्मिक कर्मकांडों की आड में दंगा भडकाने का हर संभव प्रयास करते हैं. गत वर्ष भी इस दर्म्यान कई शहर और जिले दंगों की चपेट में आगये थे. भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहा कि इस बार दादरी, वाराणसी की घ्रणित घट्नायें और करहल, गोंडा सहित प्रदेश में सौ से अधिक दंगे होचुके हैं. त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों और बिहार में चल रहे विधान सभा चुनावों में वोटों को विभाजित करके लाभ उठाने की कोशिशें भी सांप्रदायिक शक्तियां लगातार कर रही हैं. अतएव राज्य सरकार के स्तर पर कडी चौकसी, निगरानी और कठोरतम कार्यवाही की जरुरत है. भाकपा को उम्मीद है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अपने दल के स्वार्थो से ऊपर उठ कर प्रदेश में अमन, शांति और सद्भाव की रक्षा के लिये कठोर से कठोर प्रशासनिक कदम जरूर उठायेंगे. भाकपा ने राज्य सरकार को सुझाव दिये हैं कि वह सुनिश्चित करे कि किसी भी मिली जुली आबादी से किसी भी समुदाय का धार्मिक जुलूस न निकाला जाये, डी.जे. तथा अन्य वाद्य यंत्रों अथवा हथियारों का प्रदर्शन हर कीमत पर रोका जाये, प्रतिमाओं अथवा ताज़ियों का विसर्जन/ दफन अनुमति के आधार पर निर्धारित स्थानों पर ही किया जाये, खुफिया एजेंसियों को सक्रिय किया जाये तथा मिली जुली आबादियों के धर्मनिरपेक्ष लोगों को लेकर बनी शांति कमेटियों को सक्रिय किया जाये. जिलधिकारियों, कप्तानों, सैक्टर मजिस्ट्रेटों और थानाध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश दे दिये जायें कि उनके क्षेत्रों में हुयी घटनाओं के लिये वे स्वयं जिम्मेदार ठहराये जायेंगे और कठोर कार्यवाही के पात्र होंगे. डा. गिरीश

Thursday, October 15, 2015

उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष की नियुक्ति को रद्द करना स्वागत योग्य: राज्य सरकार नैतिक जिम्मेदारी ले- भाकपा

लखनऊ- 15. 10. 15—भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष श्री अनिल यादव की नियुक्ति को रद्द करने के निर्णय का स्वागत किया है. भाकपा ने उत्तर प्रदेश सरकार से श्री यादव की अवैध नियुक्ति की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का आग्रह किया है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि राज्य सरकार ने लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष जैसे अत्यंत महत्त्वपूर्ण पद पर सारे नियम, कानून और परंपराओं को ताक पर रख कर श्री अनिल यादव को नियुक्त किया था. श्री अनिल यादव ने भी अपनी नियोक्ता उत्तर प्रदेश सरकार के ही नक्शे कदम पर चलते हुये और सरकार में बैठे लोगों के राजनैतिक और आर्थिक हितों को साधते हुये हर स्तर की नियुक्तियों में हर स्तर की धांधलेबाजी की थी. उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में शर्मनाक तरीके से होरही इस घपलेबाजी से अभ्यर्थी ही नहीं समाज का बडा भाग परेशान था. छात्र- नौजवानों ने तमाम आंदोलन किये और राज्य सरकार मौन साधे रही. मजबूरन अभ्यर्थियों और कुछ अन्य को अदालत का दरवाजा खटखटाना पडा. कल उच्च न्यायालय ने अपना दो टूक निर्णय सुनाते हुये राज्य सरकार को भी कटघरे में खडा किया है. यह पहली नियुक्ति नहीं है जिसको लेकर राज्य सरकार बेनकाब हुयी हो. कुछ ही दिन पूर्व उच्चतर शिक्षा चयन आयोग और माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग के अध्यक्षों और उच्चतर शिक्षा आयोग के तीन सदस्यों को भी उनकी अवैध नियुक्तियों के कारण उच्च न्यायालय के फैसलों के तहत हठाया जाचुका है. माध्यमिक शिक्षा चयन आयोग के तीन सदस्यों के कार्य पर भी न्यायालय ने रोक लगा रखी है. लोकपाल की नियुक्ति के सवाल पर भी राज्य सरकार अदालत के फैसले से बेनकाव होचुकी है. इन सभी के द्वारा की गयीं नियुक्तियों पर भी सैकडों सवाल खडे होरहे हैं. लेकिन राज्य सरकार पूरी तरह खामोश है. इससे राज्य सरकार के खिलाफ आक्रोश उमडना स्वाभाविक है. उत्तर प्रदेश में हर तरह की नियुक्तियों में हर स्तर पर धांधली चल रही है अतएव अक्सरकर नियुक्तियों को न्यायालय में चुनौती दे दी जाती है और नियुक्त अनियुक्त बेरोजगार हाथ मलते रह जाते हैं. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि एक के बाद एक अवैध नियुक्ति और उच्च न्यायालय द्वारा उन्हें अवैध करार दिये जाने के बावजूद राज्य सरकार ने न तो अपनी गलतियों को स्वीकारा है न ही इन धांधलियों की नैतिक जिम्मेदारी ली है. राज्य सरकार के मुखिया को इस सब की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिये और तदनुसार कदम उठाना चाहिये. डा. गिरीश,

Monday, October 5, 2015

महंगाई, दादरी प्रकरण और सूखे जैसे मुद्दों पर भाकपा ने राज्य भर में धरने प्रदर्शनों का आयोजन किया.

महंगाई, सूखा, दादरी प्रकरण एवं अन्य सवालों पर भाकपा ने जिलों जिलों में धरने प्रदर्शन किये और ज्ञापन सौंपे लखनऊ- 5 अक्तूबर - भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य मुख्यालय द्वारा जारी विज्ञप्ति के अनुसार भाकपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के निर्देशानुसार आज समूचे उत्तर प्रदेश में आसमान लांघ रही महंगाई, भयावह सूखा, दादरी का जघन्य हत्याकांड, भाकपा कार्यकर्ताओं पर जगह जगह लगाये जारहे फर्जी मुकदमे, प्रदेश में सभी को एक समान शिक्षा की व्यवस्था तथा अनुसूचित जातियों की जमीनों को हडपने के लिये राज्य सरकार द्वारा कानून में बदलाव किये जाने जैसे सवालों पर जिला मुख्यालयों पर धरने प्रदर्शन किये गये. कई जिलों में इन कार्यक्रमों में भाकपा के साथ अन्य वामपंथी दलों- क्रमशः माकपा, भाकपा- माले आदि ने भी शिरकत की. यहाँ जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहाकि केन्द्र की एन डी ए सरकार द्वारा चलाई जारही नीतियों के चलते महंगाई ने सारे रिकार्ड तोड़ दिए हैं. दाल, सब्जी, तेल सहित जरूरी चीजों के आसमान छूरहे मूल्यों ने गरीब और आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है. इसका प्रमुख कारण केन्द्र सरकार की आर्थिक नीतियाँ हैं. उदाहरण के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बेहद कम होने के बावजूद सरकार ने पटल और डीजल आदि कि कीमतें काफी ऊंची कर रखी हैं. राज्य सरकार ने भी पेट्रोल डीजल पर टैक्स बढ़ा कर, बिजली की कीमतें बढ़ा कर तथा राशन प्रणाली को पंगु करके महंगाई की धार को और भी तीखा बना दिया है. उन्होंने कहाकि आज समूचे उत्तर और मध्य भारत में भयावह रूप से सूखा पड़ा हुआ है लेकिन न तो इन राज्यों को सूखा पीड़ित घोषित किया गया है और न सूखे से निपटने को कोई भी कदम केन्द्र और राज्य सरकार ने उठाये हैं. मौसम की मार से गत रबी और खरीफ की फसलों की हानि की एबज में किसानों को राहत दी नहीं गयी है. भाकपा इस बात पर गहरा रोष प्रकट करती है कि आरएसएस/ भाजपा की यह सरकार हर मोर्चे पर असफल होजाने के बाद लोगों को आपस में बांटने के लिए खुलकर सांप्रदायिकता फैला रही है, यहाँ तक निर्दोष गरीबों का खून बहा रही है. दादरी के बिसाहडा की घटना की जितनी निंदा की जाये कम है. इस घटना की आड़ में भाजपा और आरएसएस तो आग लगाने पर आमादा हैं ही राज्य सरकार भी राजनीति करने से बाज नहीं आरही. सच तो यह है कि वहां राज्य सरकार भाजपा को अपना खेल खेलने के लिये प्लेटफार्म मुहैया करा रही है और शांति चाहने वाले दलों की राह में रोड़े अटका रही है. वाराणसी, गोंडा और अन्य जिलों में भी दंगे कराने की हर कोशिश की जारही है. भाकपा माननीय उच्च न्यायालय के उस निर्णय जिसमें सभी को समान शिक्षा देने का राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है का पूर्ण समर्थन करती है. साथ ही अनुसूचित जाति के किसानों की जमीनों को हथियाने की गरज से राज्य सरकार द्वारा कानून में परिवर्तन किये जाने की साजिश की भर्त्सना करती है. भाकपा ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया कि वह कानून व्यवस्था के मोर्चे पर पूरी तरह असफल है और राज्य में उसकी पुलिस दमन और शोषण का पर्याय बन चुकी है. चूंकि भाकपा कार्यकर्ता उसकी करतूतों का जगह जगह विरोध कर रहे हैं तो बौखलाई पुलिस उन पर फर्जी मुकदमे लगा कर दमन चक्र चला रही है. हाल ही में अमरोहा में पुलिस ने भाकपा राज्य सचिव मंडल के सदस्य का. अजय सिंह, सागर सिंह एवं नरेश चन्द्र को संगीन धाराओं में बंद कर दिया और बिजनौर के जिला सचिव का. रामनिवास जोशी पर गैंगस्टर लगा दिया. लखनऊ में भाकपा के जिला सचिव मो. खालिक के नेतृत्व में उप्जिलाधिकरिनको ज्ञापन सौंपा गया तथा वामदलों के साथ मिल कर पटेल प्रतिमा पर धरना दिया गया. समाचार प्रेषित किये जाने तक आज़मगद, मेरठ, मुरादाबाद, हाथरस, आगरा, बाँदा सुल्तानपुर, जौनपुर, अलीगढ, गाज़ियाबाद गोरखपुर आदि लगभग ४० जिलों से धरने, प्रदर्शन और ज्ञापन देने की खबरें राज्य मुख्यालय को प्राप्त होचुकी हैं. डा.गिरीश

Thursday, October 1, 2015

उत्तर प्रदेश को सांप्रदायिकता की आग में झौंकने की संघ परिवार साजिश कर रहा है. भाकपा

लखनऊ- 1 अक्तूबर, 2015- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उत्तर प्रदेश के राज्य सचिव मंडल ने भारतीय जनता पार्टी और आर.एस.एस. पर आरोप लगाया है कि वे अपने दीर्घकालीन और तात्कालिक उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिये उत्तर प्रदेश और समूचे देश को सांप्रदयिक्ता और सांप्रदायिक दंगों की आग में झौंकने की साजिश में जुटे हैं. क्षुद्र राजनैतिक उद्देश्यों की खातिर की जारही हिंसा, विभाजन की इन कार्यवाहियों की भाकपा ने कड़े शब्दों में निंदा की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के किसी न किसी हिस्से में अलग अलग बहानों से भाजपा और संघ परिवार ने सांप्रदायिक विद्वेष फैला कर प्रदेश को दंगों की आग में झौंकने का काम किया है. सबसे ताजा घटना दिल्ली से सटे जनपद- गौतम बुध्द नगर (नोएडा ) की है जहां औद्योगिक क्षेत्र- दादरी के थाना- जारचा के गांव- विसाहड़ा में सोमवार की रात्रि लगभग एक हजार लोगों की उन्मादी भीड़ ने गांव के एक मुस्लिम परिवार के घर पर धाबा बोल दिया और घर के मुखिया इखलाक को पीट- पीट कर मार डाला तथा उसके बेटे दानिश को भी बुरी तरह पीटा जो अस्पताल में जीवन के लिये संघर्ष कर रहा है. उपद्रवियों ने घर की महिलाओं को भी नहीं बख्शा और घर का सारा सामान भी नष्ट- भ्रष्ट कर दिया. घटना को अंजाम देने के लिये इन उपद्रवियों ने एक मंदिर पर लगे माइक से सोची समझी साजिश के तहत यह प्रसारित किया कि इखलाक ने गोकशी की है और वहां पड़ा मांस का टुकड़ा गाय का है. यह संघ परिवार द्वारा समाज में घोले जारहे जहर का ही परिणाम है कि इस बे सिर पैर की अफवाह पर हजार एक लोग एकत्रित होगये और वर्षों पुराने अपने पडौसी के खून के प्यासे बन गये. भीड़ हिंसा करती रही और कोई भी पडौसी वचाव के लिये नहीं आया. पुलिस भी सूचना के काफी देर बाद पहुंची. पुलिस और प्रशासन की ढिलाई का ही परिणाम है कि पुलिस द्वारा पकड़े लोगों को छुडाने को भीड़ ने पुलिस पर हमला तक बोला. इतना ही नहीं अगले दिन आसपास के गांवों में अफ्वाहें फैला कर तनाव पैदा किया गया और विसाहड़ा से लगभग 5 कि.मी. दूरी पर स्थित गांव- ऊंचा अमीरपुर में कथित गोहत्या के दोषियों को फांसी पर लट्काने की मांग के बहाने बड़े पैमाने पर तोड़्फोड़ की गयी. इन घटनाओं से संपूर्ण क्षेत्र में तनाव व्याप्त है और विसाहड़ा सहित तमाम गांवों के अल्पसंख्यक पलायन कर रहे हैं. अभी पिछले ही सप्ताह प्रधानमंत्री मोदी के चुनाव क्षेत्र वाराणसी में एक साधु गिरोह ने जो कि संघ परिवार का ही आउट्फिट है गंगा में गणेश प्रतिमायें विसर्जित करने के लिये हंगामा खड़ा कर दिया, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के अनुसार गंगा में प्रतिमायें विसर्जित नहीं की जासकतीं. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि अपने राजनैतिक उद्देश्यों की प्रतिपूर्ति के लिये संघ परिवार गंगा को पवित्र बनाने के नाम पर तमाम नाटक नौटंकी करता रहता है. पुलिस प्रशासन यहाँ भी दो दिनों तक नाटक करता रहा और कठोर कार्यवाही को अंजाम नहीं दिया. अब साधुओं की पिटाई के नाम पर भाजपा और संघ परिवार वहां तनाव बढाने को हर हथकंडा अपना रहे हैं. ठीक इसी तर्ज पर गत सप्ताह गोंडा शहर में मूर्ति विसर्जन को जारहे जलूस में पाबंदी के बावजूद डीजे लगाया गया जिसे पुलिस ने नहीं रोका. जब ये जुलूस अल्पसंख्यक बहुल आबादी में पहुंचा तो वहां तनाव व्याप्त होगया. मौके का लाभ उठा कर उपद्रवियों ने आगजनी और लूट्पाट की. समूचे उत्तर प्रदेश की इन दिनों ऐसी ही तस्वीर है जब त्योहारों के कर्मकाण्डों को बहाना बना कर दंगे फैलाने की साजिश रची जारही है. इसका तात्कालिक उद्देश्य उत्तर प्रदेश में चल रहे पंचायत चुनावों और बिहार विधान सभा के चुनावों में लाभ उठाना है. धर्मपरायणता और सांप्रदायिकता क्योंकि शासक वर्ग और उसकी सरकारों के जनविरोधी कार्यों को जनता में स्वीकार्य बनाती है, अतएव केंद्र और राज्य सरकार का रवैय्या दंगे फसाद रोकने का नहीं; उनके होजाने के बाद राजनैतिक रोटियां सैंकने का है. भाजपा जहां हर जगह खुल कर दंगाइयों के साथ खड़ी है वहीं मुख्यमंत्री श्री अखिलेश यादव ने अपने को दरोगा की तरह धमकी देने और मुआबजा जारी करने तक सीमित कर रखा है. ऐसे में भाकपा समाज के सभी धर्मनिरपेक्षजनों से अपील करती है कि वे उत्तर प्रदेश की शांति और सहिष्णुता को बचाने के लिये आगे आयें. भाकपा राज्य सरकार से भी मांग करती है कि वह सांप्रदायिकता से निपटने को द्रढ इच्छाशक्ति का परिचय दे और तदनुसार अपनी पुलिस और प्रशासन की चूलें कसे. डा. गिरीश

Wednesday, September 30, 2015

जनवादी क्रांतियों का इतिहास और उनसे सबक

सामाजिक क्रांति समाज के ढांचे में मूलभूत बदलाव या परिवर्तन होता है। कार्ल मार्क्स ने क्रांति की समझ को वैज्ञानिक आधार पर खड़ा किया। उन्होंने अपने युग के काल्पनिक (यूटोपियन) सामाजिवादियों का विरोध करते हुए वैज्ञानिक समाजवाद के सिद्धांत का विकास किया। मार्क्स के अनुसार क्रांतिकारियों को समाज में सक्रिय वस्तुगत नियमों का वैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिए। तभी हम समाजवाद और कम्युनिज्म की ओर बढ़ सकते हैं। 
साम्राज्यवाद के युग में जनवादी क्रांति
लेनिन ने पूंजीवाद की साम्राज्यवादी मंजिल का सबसे पहले अध्ययन किया। उन्होंने क्रांति-संबंधी मार्क्स के सिद्धांत में कई नई बातें जोड़ीं। साम्राज्यवाद पूंजीवाद की अगली और उच्चतर मंजिल होती है। इसमें कुछ मुट्ठीभर सबसे बड़े पूंजीपति (इजारेदार) बाकी सारे समाज का शोषण करते हैं। बड़े पूंजीपति न सिर्फ मेहनतकशों, मजदूरों, किसानों, मध्यम तबकों, बुद्धिजीवियों का बल्कि गैर-इजारेदार पूंजीपतियों का भी शोषण करते हैं, उनके विकास में बाधा पहुंचाते हैं। इन गैर-इजारेदार पूंजीपतियों छोटे, मझोले और निम्न पूंजीपति शामिल होते हैं।
लेनिन ने ‘जनवादी क्रांति’ का सिद्धांत विकसित किया। समाजवादी क्रांति एक मंजिल या एक छलांग में नहीं होगी।
समाजवाद की ओर बढ़ने के लिए बीच की एक या कई मंजिलों से गुजरना होगा। इन्हें ही लेनिन ने ‘पूंजीवादी जनवादी क्रांति’ या जनवादी क्रांति कहा। इसके लिए सामंतों, बड़े पूंजीपतियों और साम्राज्यवाद के विरोध में एक व्यापक जनवादी मोर्चे की जरूरत है।
पंूजीवाद की इस मंजिल को ‘साम्राज्यवाद’ कहा जाता है। अमरीका जैसे देश सारी दुनिया में बड़ी पूंजी का प्रभुत्व कायम करते हैं। अमरीका-विरोधी मोर्चे में छोटे पूंजीपति और छोटे पूंजीवादी देश भी पिसते हैं।
आज के युग में क्रांति
जैसा कि हमने कहा, सारी जनता बड़े-बड़े इजारेदारों और साम्राज्यवादियों के खिलाफ संघर्ष कर रही है। इस संघर्ष में न सिर्फ समाजवाद को मानने वाले लोग शामिल हैं बल्कि वे भी जो समाजवाद से सहमत नहीं हैं। अमरीका का विरोध करने वालों में न सिर्फ मजदूर और किसान शामिल हैं बल्कि मध्यम तबके, बुद्धिजीवी, छोटे और मझोले मालिक (पूंजीपति) भी उसमें हिस्सा ले रहे हैं।
इसलिए समाजवाद की ओर जाने का रास्ता कई मंजिलों से होकर गुजरता है। इस रास्ते में आजादी हासिल करनी होती है, बड़ी विशाल कम्पनियों पर रोक लगानी होती है, बड़ी वित्त पूंजी, विदेशी पूंजी की घुसपैठ और साम्राज्यवादी देशों की कार्रवाईयों पर अंकुश लगाना होता है।
इन बाधाओं को दूर करते हुए देश और समाज के ज्यादा से ज्यादा तबकों और वर्गों को एक मंच पर लाना होता है। इनमें से कई जनवादी होते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि वामपंथी और समाजवादी ही हों।
इसे ही जनवादी एकता (मोर्चा) कहते हैं। ऐसी एकता जो काम पूरे करती है उसे जनवादी परिवर्तन कहते हैं।
जनवादी क्रांतियों का इतिहास
सबसे पहले सफल रूसी क्रांति (1917) में हुई जिसके नेता लेनिन थे। इसमें प्रमुख शक्तियां मजदूर और किसान थे। उन्होंने सोवियतें बनाई। इसलिए उस देश को सोवियत संघ कहा गया।
रूसी क्रांति के तीन मुख्य नारे थे - शंाति, रोटी और जमीन। ये तीनों जनवादी नारे हैं। शांति का मतलब साम्राज्यवादी युद्ध (1914-18) बंद करो। शांति और निःशस्त्रीकरण का नारा सबसे पहली बार दिया गया। यह समूची मानवता के लिए था, केवल कुछ मुट्ठी भर साम्राज्यवादियों को छोड़।
दूसरा नारा था सबकों का रोटी। यह सभी मेहनतकशों, मध्यमवर्गों और कामकाजी लोगों तथा किसानों के लिए था - वास्तव में सभी मानवों के लिए था।
तीसरा था जमीन का नारा। यह मुख्य रूप से किसानों के लिए था। लेकिन किसानों में भी भूमिहीनों और गरीब किसानों के लिए था। यह मुख्यतः बड़े सामंतों के खिलाफ और जमीन के बंटवारे (भूमि सुधारों) के लिए था।
इन तीनों को हम जनवादी कदमों का उद्देश्य कहते हैं। वे जनतांत्रिक बदलाव लाते हैं, समाजवाद के लिए आधार तैयार करते हैं लेकिन अभी समाजवाद नहीं हैं।
अन्य देशों में जनवादी आंदोलन
रूसी क्रांति ने दूसरे देशों में जनता का आंदोलन तेज कर दिया। कहीं आजादी की मांग उठने लगी, कहीं जनतंत्र की, तो कही समाजवाद की। भारत, चीन, वियतनाम, एशिया, अफ्रीका में आजादी की लड़ाई तेज हो गई। भारत आजाद हो गया। वियतनाम तथा चीन में क्रांतियां हो गईं। आगे चलकर पूर्वी यूरोप, क्यूबा और लैटिन अमरीका में भी जनवादी एवं समाजवादी क्रांतियां हो गईं।
पूर्वी योरप (यूरोप)
9 मई 1945 को हिटलर के जर्मन फासिस्टों ने आत्म-समर्पण कर दिया। हिटलर ने उससे पहले ही आत्महत्या कर ली। रूस की लाल सेना की मदद से पूर्वी योरप के देश आजाद हो गए - पोलैंड, बल्गारिया, चेकोस्लोवाकिया, रोमानिया, आदि। इन देशों में जनता की मिली-जुली जनवादी सरकारें बनीं (1944-45 में)।
वियतनाम
उसने पहले फ्रांसीसियों, फिर जापानियों, फिर फ्रांसीसियों और अमरीका के खिलाफ आाजदी की लड़ाई लड़ी। वियतनाम सबसे पहले 2 सितंबर 1945 को आजाद हुआ। वियतनाम ने पहले देश की आजादी की लड़ाई लड़ी, फिर उसने जनवादी क्रांति का काम शुरू किया। लम्बे संघर्षों के बाद 1975 में पूरी तरह आजाद हुआ। लाओस और कम्पूचिया (कम्बोडिया) भी आजाद हुए। वियतनाम की क्रांति में कम्युनिस्टों के साथ बौद्ध धर्म वाले तथा छोटे मझोले मालिक भी शामिल हैं।
चीन
चीन में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में किसानों, और मालिकों और मजदूरों की लम्बी लड़ाई चली। जनतांत्रिक अधिकार, पार्टी बनाने के अधिकार तथा संसदीय प्रणाली न होने के कारण चीन में ज्यादातर हथियारबंद संघर्ष हुआ।
चीनी क्रांति की मांग सामंतवाद समाप्त करने, किसानों के बीच जमीन का बंटवारा करने और बड़े तथा विदेशी उद्योगों का राष्ट्रीयकरण करने संबंधित था। इसलिए चीनी क्रांति को वहां की पार्टी ने जनवादी क्रांति बतलाया है। आज भी चीन में अर्थव्यवस्था ‘समाजवाद की ओर’ जा रही है, अभी समाजवादी नहीं है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की योजना के अनुसार चीन 21वीं सदी के मध्य तक ‘बाजार समाजवाद’ की ‘प्राथमिक मंजिल’ में रहेगा।
चीन में 1 अक्टूबर 1949 को क्रांति सम्पन्न हुई। कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में चार वर्गों के संयुक्त मोर्चा ने सत्ता संभाली। सरकार ने पहले जनवादी मंजिल के काम पूरा करने का फैसला लिया।
आज चीन उत्पादन बढ़ाने की शक्तियों, उसकी टेक्नालोजी के विकास तथा विकास दर बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित कर रहा है।
क्यूबा
क्यूबा में 21 जुलाई 1959 को क्रांतिकारियों ने सत्ता अपने हाथों में ले ली। वे आरम्भ में कम्युनिस्ट नहीं थे। उन्होंने कदम-ब-कदम जनतांत्रिक कदम उठाए और देश की अर्थव्यवस्था विकसित की। आज क्यूबा मध्यम दर्जे का देश है जहां आम जनता को कई प्रकार की सुविधाएं और अधिकार मिले हुए हैं।
भारत
अंग्रेजों के खिलाफ लम्बे साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष के बाद भारत ने 1947 में आजादी हासिल की। यह भी जनवादी क्रांति का ही एक रूप है, उसकी ही एक मंजिल। इसके लिए व्यापक शक्तियों ने मिल-जुल कर संघर्ष किया।
अब जनवादी क्रांति की अगली मंजिलें तय करने के लिए जनतांत्रिक शक्तियों को मिल-जुल कर मुख्य विरोधियों के संघर्ष करना होगा, जैसे साम्राज्यवाद, बड़े इजारेदार, वित्त पूंती।
इस संघर्ष में संसदीय प्रणाली की प्रमुख भूमिका होगी और जनसंघर्ष महत्वपूर्ण होाग।
अन्य देश
आज के समय में लैटिन अमरीका के दर्जन-भर देशों में महत्वपूर्ण जनवादी परिवर्तन हो रहे हैं। ब्राजील, बेनेजुएला, इक्वाडोर, बोलीविया तथा अन्य देशों में संसदीय प्रणाली के जरिए तथा विशाल जन समर्थन की सहायता से वाम एवं जनवादी ताकतें चुनाव जीतकर सरकारें बना रही हैं। वे लगातार पिछले लगभग दो दशकों (20 वर्षों) से जीतती आ रही है।
यह नई किस्म की जनवादी क्रांति है जो संसदीय चुनावी मार्ग से सफल हो रही हैं। उनका समर्थन फौज कर रही है। इनमें व्यापक ताकतें शामिल हैं जिनमें छोटे मालिकों और उत्पादकों तथा साम्राज्यवाद-विरोधी पूंजीपति वर्ग के हिस्से भी शामिल हैं
लैटिन अमरीका के परिवर्तन पिछली सभी क्रांतियों से अलग हैं। आज जनता के हक में बड़े पंूजीवादी हितों के खिलाफ तथा गरीबी कम करने के लिए ये जनवादी सरकारें संघर्षरत हैं।
इनके अलावा नेपाल, योरप, दक्षिण अफ्रीका, इत्यादि में भी परिवर्तन चल रहे हैं।
आज की और भविष्य की क्रांतियां
आज हमारे देश और दुनिया भर में जनतांत्रिक अधिकारों और प्रजातांत्रिक तरीकों का महत्व बढ़ गया है। आज विश्व भर में सामाजिक परिवर्तन में चुनाव प्रणाली का महत्व पहले से ज्यादा हो गया है, जैसा कि लैटिन अमरीका की घटनाएं साबित करती हैं। चुनावों, वोट डालने और प्रेस-मीडिया के तथा अन्य अधिकार हमने लम्बे संघर्षों के जरिए जीते हैं। उनका प्रयोग करके वाम एवं प्रगतिशील शक्तियां सत्ता में आ सकती हैं और जनता के हक में कुछ करके दिख सकती हैं, यह अमल में साबित हो चुका है।
क्रांति कोई भविष्य में चीज नहीं रह गई है, वह इस समय जारी है। कुछ महत्वपूर्ण आर्थिक-सामाजिक कदम उठाना भी जनतांत्रिक क्रांति का ही अंग है। आज हम जनतांत्रिक तरीकों का इस्तेमाल करके जनवादी क्रांति पूरा कर सकते हैं। पुराने ढंग की क्रांतियों का युग चला गया।
आज नए किस्म की व्यापक जनतंत्रिक परिवर्तनों का युग है जो प्रजातांत्रिक तरीकों का प्रयोग कर रहे हैं।
- अनिल राजिमवाले

Monday, July 13, 2015

केंद्र की भाजपा गठ्बंधन सरकार और उत्तर प्रदेश सरकार के जनविरोधी कृत्यों के खिलाफ सड्कों पर उतरेगी भाकपा

लखनऊ 13 जुलाई। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राज्य काउंसिल की दो दिवसीय बैठक यहां प्रो. सुहेव शेरवानी एवं का. मोतीलाल ऐडवोकेट की अध्यक्षता में संपन्न हुयी। बैठक में आंदोलन और संगठन संबंधी कई महत्त्वपूर्ण निर्णय लिये गये।
बैठक में लिये गये निर्णयों की जानकारी देते हुये भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि केंद्र सरकार को सत्ता में आये अभी 14 महीने पूरे नहीं हुये लेकिन इसके और भाजपा की सारी राज्य सरकारों के तमाम घोटाले सामने आ चुके हैं। मोदीगेट में जहां केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया पर गंभीर आरोप हैं तो मानव संसाधन मन्त्री स्मृति ईरानी अपनी योग्यता के फर्जी प्रमाणपत्र प्रस्तुत करने के आरोपों में घिरी हैं। मध्यप्रदेश में इसके मुख्यमंत्री व्यापमं घोटाले और उसके सबूत मिटाने के आरोपों में लिप्त हैं और प्रकरण की सीबीआई जांच घोषित हो जाने के बावजूद इस्तीफा नहीं दे रहे हैं। महाराष्ट्र के दो-दो मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप हैं तो छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री भी सार्वजनिक धन के गोलमाल के आरोपों का सामना कर रहे हैं। लगता है भाजपा सत्ता में आने के बाद कांग्रेस की पचास साल की लूट को पांच सालों में पीछे छोड देने की योजना पर काम कर रही है।
भाकपा का आरोप है कि तमाम मोर्चाें पर विफल हो चुकी उत्तर प्रदेश की सरकार भ्रष्टाचार में अन्य सरकारों से एक कदम भी पीछे नहीं है। भ्रष्टाचार राज्य में अघोषित वैधता हासिल कर चुका है। सिविल सेवा, पुलिस और अन्य भर्तियों में मनमाना कदाचार चल रहा है। राज्य में अवैध खनन अवैध कमाई का जरिया बन चुका है। शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे जनोपयोगी कार्य भी भ्रष्टाचार की जकड में हैं। सरकार के कई मंत्रियो पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोपों के बावजूद उन्हें पदों से हटाया नहीं गया। शासन-प्रशासन में ऊपर से नीचे तक फैला भ्रष्टाचार आम जनता की लूट का औजार बना हुआ है।
भाकपा राज्य काउंसिल ने केंद्र और राज्य सरकार के घपले-घोटालों और भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्य वामदलों के साथ मिल कर 20 जुलाई को राज्य के सभी मुख्यालयों पर धरने प्रदर्शन आयोजित कर संघर्षों की शुरूआत करने का फैसला लिया है।
भाकपा  राज्य सचिव डा. गिरीश ने बताया कि किसानों को तबाह करने के लिये केंद्र सरकार जमीन अधिग्रहण संबंधी कानून को पलटने जा रही है। वह किसानों की जमीनों को कारोबारियों को दे देना चाहती है। उत्तर प्रदेश में तो जमीन हड़पने का काम बडे पैमाने पर शुरु हो गया है। जमुना एक्स्प्रेस वे प्राधिकरण ने हाथरस जनपद के 421 गांवों को अपने अधीन लेने की अधिसूचना जारी की है। मौसम की मार से तबाह किसानों को पर्याप्त राहत नहीं प्रदान नहीं की गयी। गन्ना किसानों की भारी राशि आज भी उन्हें अदा नहीं की गयी। उनकी उपजों के लागत मूल्य भी उन्हें मिल नहीं पा रहे। वे गंभीर आर्थिक संकटों से जूझ रहे हैं। अतएव भाकपा ने किसान संगठनों द्वारा 1 सितंबर को प्रस्तावित आंदोलन को पूरी तरह समर्थन प्रदान करने का संकल्प लिया है।
इसी तरह भारत के श्रमिक वर्ग को कानूनी तौर पर असहाय बनाने और उद्योगपति-कारोबारियों को उनको हर तरह से शोषण करने में सक्षम बनाने को केंद्रीय श्रम कानूनों में परिवर्तन किया जा रहा है जिसके विरुद्ध देश के लगभग सभी श्रमिक संगठन 2 सितंबर को हड़ताल करने जा रहे हैं। भाकपा ने इस हड़ताल को संपूर्ण समर्थन प्रदान करने का निर्णय भी लिया है। इसके अलावा सांप्रदायिकता के खतरों से जनता को आगाह करने और महंगाई जैसे सवालों को लेकर पार्टी निरंतर अभियान चलाती रहेगी।
बैठक में भाकपा के सचिव का. अतुल कुमार अंजान खास तौर पर मौजूद थे। काउंसिल बैठक को संबोधित करते हुये उन्होंने राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होने उपर्युक्त सभी अभियानों को व्यापक और सफल बनाने की अपील की।

Friday, June 19, 2015

बिजली की बड़ी कीमतें वापस नहीं ली गयीं तो सडकों पर उतरेगी भाकपा

लखनऊ-१९ जून २०१५. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत् नियामक आयोग द्वारा प्रदेश में एक साथ विद्युत् मूल्यों में की १७ प्रतिशत बढ़ोत्तरी की कड़े शब्दों में आलोचना की है. भाकपा ने राज्य सरकार से बढ़ी कीमतों को तत्काल वापस लेने की मांग की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा.गिरीश ने कहा कि राज्य में बिजली की दरें पहले से ही कई राज्यों से अधिक हैं, अब उपभोक्ताओं पर एक साथ १७ प्रतिशत बिजली कीमतों की वृध्दि थोप दी गयी है. यह कैसी बिडंबना है कि जो सरकार जनता को उसकी जरूरत के लायक बिजली नहीं दे पारही, वह लगातार उसकी कीमतों में इजाफा करती जारही है. निजी उत्पादकों से महंगी बिजली खरीदने, विद्युत् विभाग में व्याप्त भारी भ्रष्टाचार और यहाँ तक कि लाइन हानियों का भार भी आम उपभोक्ता पर लादा जारहा है. डा.गिरीश ने कहा कि केन्द्र और राज्य सरकार द्वारा चलायी जारही नीतियों के परिणामस्वरूप जनता पहले से ही महंगाई के बोझ तले दबी हुयी है. केन्द्र द्वारा पेट्रोलियम पदार्थों की ऊँची कीमतें बसूलने के अलाबा कई कदम उठाये गये हैं जिनसे महंगाई ने छलांग लगाई है. इसके अतिरिक्त प्रदेश सरकार अपने नागरिकों से पेट्रोलियम पदार्थों पर पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक वेट बसूल कर रही है, यहाँ अधिक वाहन कर बसूला जारहा है और वाहन कर बसूलने के बाद ऊपर से वाहनों पर टोल टेक्स भी बसूला जारहा है. जनता की लुटाई में केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच होड़ मची है. महंगाई से जनता की कमर टूटी जारही है. बिजली की कीमतों में ताजा बढोत्तरी ने जनता की तबाही का रास्ता खोल दिया है. भाकपा इस पर कड़ा विरोध प्रकट करती है और राज्य सरकार से मांग करती है कि वह इस बढोत्तरी को तत्काल रद्द करे. भाकपा इस मुद्दे पर जनता के साथ है और सरकार ने इस वृध्दि को रद्द नहीं किया तो वह सडकों पर उतरने को बाध्य होगी. भाकपा ने अपनी जिला इकाइयों से भी अनुरोध किया है कि यदि बिजली कीमतों में हुयी वृध्दि को २४ घंटों के भीतर वापस नहीं लिया जाता तो वह जनता के हित में और जनता को साथ लेकर जनवादी तरीकों से विरोध प्रदर्शन करें. डा. गिरीश

Friday, June 12, 2015

पत्रकार जगेन्द्र की हत्या की जांच एस.आई. टी. से कराये राज्य सरकार : भाकपा

लखनऊ- १२ जून : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने शाहजहांपुर के पत्रकार श्री जगेन्द्र की हत्या की कठोरतम शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने इस हत्या की एसआईटी से जांच कराने तथा हत्या की साजिश के आरोपी राज्य सरकार के राज्यमंत्री को पद से हठाने की मांग राज्य सरकार से की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि पत्रकार जगेन्द्र की हत्या शासन और प्रशासन की क्रूरता का परिचायक है. इसकी जितनी निन्दा की जाये कम है. यह घटना इसलिए और चिन्ताजनक है कि इसकी साजिश रचने में एक राज्य मंत्री का नाम आरहा है. अतएव सामान्य जांच से न्याय की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है. इसीलिये हत्या की जांच एसआईटी से कराने की मांग उठ रही है. चूंकि इस जघन्य वारदात के पीछे एक राज्यमंत्री का नाम आरहा है अतएव उन्हें हठाने के बाद ही निष्पक्ष जांच की अपेक्षा की जा सकती है. भाकपा इन दोनों मांगों का पुरजोर समर्थन करती है. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति बद से बदहाल है. हत्या, लूट के अलाबा महिलाओं और अन्य कमजोर तबकों का उत्पीडन बड़े पैमाने पर होरहा है. अभी कुछ दिनों पहले शाहजहांपुर में ही दलित महिलाओं को शर्मनाक तरीके से बेइज्जत करने की वारदातें हुयीं. अत्याचारों और अन्याय का विरोध करने वाले राजनैतिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर हमले तेज होगये हैं. सता, अपराधी और पुलिस गठजोड़ आम आदमी पर भारी पड़ रहा है.राज्य सरकार को इसका निराकरण करना चाहिए. डा. गिरीश

पत्रकार जगेन्द्र की हत्या की जांच एस.आई. टी. से कराये राज्य सरकार : भाकपा

लखनऊ- १२ जून : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने शाहजहांपुर के पत्रकार श्री जगेन्द्र की हत्या की कठोरतम शब्दों में निंदा की है. भाकपा ने इस हत्या की एसआईटी से जांच कराने तथा हत्या की साजिश के आरोपी राज्य सरकार के राज्यमंत्री को पद से हठाने की मांग राज्य सरकार से की है. यहां जारी एक प्रेस बयान में भाकपा के राज्य सचिव डा. गिरीश ने कहा कि पत्रकार जगेन्द्र की हत्या शासन और प्रशासन की क्रूरता का परिचायक है. इसकी जितनी निन्दा की जाये कम है. यह घटना इसलिए और चिन्ताजनक है कि इसकी साजिश रचने में एक राज्य मंत्री का नाम आरहा है. अतएव सामान्य जांच से न्याय की कोई उम्मीद नहीं की जा सकती है. इसीलिये हत्या की जांच एसआईटी से कराने की मांग उठ रही है. चूंकि इस जघन्य वारदात के पीछे एक राज्यमंत्री का नाम आरहा है अतएव उन्हें हठाने के बाद ही निष्पक्ष जांच की अपेक्षा की जा सकती है. भाकपा इन दोनों मांगों का पुरजोर समर्थन करती है. भाकपा राज्य सचिव ने कहा कि उत्तर प्रदेश में कानून और व्यवस्था की स्थिति बद से बदहाल है. हत्या, लूट के अलाबा महिलाओं और अन्य कमजोर तबकों का उत्पीडन बड़े पैमाने पर होरहा है. अभी कुछ दिनों पहले शाहजहांपुर में ही दलित महिलाओं को शर्मनाक तरीके से बेइज्जत करने की वारदातें हुयीं. अत्याचारों और अन्याय का विरोध करने वाले राजनैतिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों पर हमले तेज होगये हैं. सता, अपराधी और पुलिस गठजोड़ आम आदमी पर भारी पड़ रहा है.राज्य सरकार को इसका निराकरण करना चाहिए. डा. गिरीश

Thursday, June 4, 2015

भाकपा महासचिव एस. सुधाकर रेड्डी का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम खुला पत्र


सेवा में,
श्री नरेन्द्र मोदी
भारत के प्रधानमंत्री
नई दिल्ली

प्रिय श्री नरेन्द्र मोदी जी,
देष के प्रधानमंत्री के पद पर आपके आने के एक साल के पूरा होने के अवसर पर आपने ”देष के नागरिकों के नाम“ जो पत्र लिखा है उसे मैंने दिलचस्पी के साथ पढ़ा हैं। आपने इस अवधि में अपनी सरकार के कामकाज के बारे में खुलासा किया है। मैं आपकी उपलब्धियों और उनके परिणामों के संबंध में हम जो महसूस करते हैं उसके संबंध में लिख रहा हूं। 
मुझे मालूम है आप मेहनत कर रहे हैं, भारत में एफडीआई लाने के लिए अनेक देषों की यात्राएं कर रहे हैं, परन्तु यह एक उचित आलोचना है कि 18 देषों की यात्रा करने में पिछले एक साल में आपने 53 दिन खर्च किये परन्तु भारत में आपने केवल 48 दिन ही यात्राएं की। आप इसका संतुलन बनायें इसकी आषा की जाती है। परन्तु आपकी विदेष यात्राएं उस तरह की राजनीतिक यात्राएं नहीं हैं जैसाकि अबसे पहले के प्रधानमंत्री किया करते थे। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की ‘बांडुंग’ जैसी कान्फ्रेंसों में देषों के प्रमुखों के साथ बातचीत और चाऊ एन लाई के साथ ‘पंचषील’ पर हस्ताक्षर जैसी यात्राएं ऐतिहासिक घटनाएं हैं। तथापि, हमारे पड़ोसियों के साथ संबंध बेहतर बनाने और एषिया एवं लैटिन अमरीका के देषों के साथ व्यापार संबंध बनाने की दिषा में आपकी कोषिषों का अच्छा नतीजा निकलना चाहिए, क्योंकि अमरीका और यूरोपीय देष संकट में हैं और भारत जैसे विकासषील देषों पर अपना बोझ फेंकने की कोषिष कर रहे हैं। 
परन्तु आपका यह दावा निराधार है कि आप ‘‘अंत्योदय’’ के सिद्धांत पर सबसे गरीब लोगों की हालत को बेहतर बनाने की कोषिष कर रहे हैं। इसके विपरीत, भूमि अधिग्रहण अध्यादेष किसानों के, खासकर गरीब किसानों के खिलाफ है। श्रम सुधार मजदूरों के खिलाफ है जो अपनी मेहनत और पसीने से देष के लिए दौलत पैदा कर रहे हैं। मजदूरों के लिए ट्रेड यूनियन बनाने के काम को मुष्किल करने का आपका सुझाव गरीबों के पक्ष में नहीं है बल्कि इससे केवल अमीर उद्योगपतियों को और अधिक शोषण करने में मदद मिलती है। 
मैं यहां उन चंद गरीब भारतीय लोगों की सूची दे रहा हूं जिन्हें आपके एक साल के राज में फायदा पहुंचा। निम्न कारपोरेटों की धन-दौलत में इस साल में जबर्दस्त बढ़ोतरी हुई।
द गौतम अडानी - 50,000 करोड़ रूपये
द भारती ग्रुप (सुनील मित्तल) 60,000 करोड़ रूपये
द सन गु्रप 1,00,000 करोड़ रूपये
द टाटा 1,10,000 करोड़ रूपये
कारपोरेट घरानों की धन दौलत में इस अवधि में कुल बढ़ोतरी 10 लाख करोड़ रूपये की हुई। जिनको फायदा पहुंचा उनमें महिन्द्रा, आईसीआईसीआई, विप्रो, एचवीएल एवं एचसीएल आदि शामिल हैं। (स्रोत: पीटीआई)।
इस एक साल में सभी आवष्यक वस्तुओं के दामों में लगातार बढ़ोतरी होती रही है क्योंकि बड़े कारोबारी जमाखोरी और फॉरवर्ड ट्रेडिंग के जरिए दामों में हेरफेर करने के लिए आजाद हैं। निष्चय ही यह जनता के पक्ष में कोई गर्व करने का रिकार्ड नहीं है। किसानों की आत्महत्याएं आज भी जारी हैं, गरीबी बढ़ रही है, अनाजों एवं अन्य सभी आवष्यक वस्तुओं के दाम बढ़ गये हैं। महिलाओं एवं दलितों पर अत्याचार और अल्पसंख्यकों पर आतंक में वृद्धि हो रही है। जिन लोगों से सर्वे किया गया उनमें 60 प्रतिषत से अधिक कह रहे हैं कि भ्रष्टाचार बढ़ गया है।
आपका दावा है कि सत्ता के दलालों का राज खत्म कर दिया गया है। परन्तु अब एक व्यक्ति का शासन पुरानी शैली वाले शासन में बदल गया है। आपका अभियान आपकी पार्टी द्वारा उस ”इंडिया शाइनिंग अभियान“ से मिलता-जुलता है जिसका 11 साल पहले आपकी पार्टी की बुरी तरह हार से पहले भारी प्रचार किया गया था। 
वित्त आयोग ने राज्यों के लिए 42 प्रतिषत की सिफारिष की है, इस बहाने पूर्वोत्तर राज्यों के स्पेषल स्टेट्स को खत्म करने की धमकी संघात्मक सिद्धांत के विरूद्ध है। परन्तु कुल मिलाकर यह राज्यों के पहले हिस्से से एक प्रतिषत कम है (छह प्रतिषत से पांच प्रतिषत)।
इसी प्रकार भाजपा शासित कुछ राज्यों में बीफ पर प्रतिबंध लगाना लोगों की खाने-पीने की आदतों के साथ हस्तक्षेप है। मुस्लिम, ईसाई, दलित, आदिवासी एवं कुछ अन्य जातियों के लोग बीफ खाते हैं। आपके मंत्री चाहते हैं कि यदि वे बीफ खाना चाहते हैं तो पाकिस्तान चले जायें। इससे यह इषारा मिलता है कि उनके कथनों, जो मूर्खतापूर्ण हैं और जो हमारी आबादी के बहुमत का अपमान करते हैं, पर आपका कोई नियंत्रण नहीं है।
आपके एक साल के राज में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ गये हैं। स्वयं देष की राजधानी में त्रिलोकपुरी में मुस्लिम विरोधी हिंसा हुई है और चर्चो एवं अन्य इसाई संस्थानों पर भयानक हमले किये गये। 
संघ परिवार के विभिन्न संगठनों के जहरीले बयानों पर आपकी सोची-समझी खामोषी उनको उत्साह मिलने का मुख्य कारण है। कृपया अपनी खामोषी को छोड़ें और अपनी पार्टी और संघ परिवार की नीति के संबंध में अपने दृष्टिकोण के बारे में बतायें। इन चीजों से हमारे देष का धर्मनिरपेक्ष ताना-बाना खतरे में पड़ रहा है। 
प्रिय श्री मोदी जी,
मैंने केवल चंद उदाहरण दिये हैं। एक साल का समय निष्चय ही समीक्षा का समय है। अपनी नीतियों पर फिर से विचार करें, कारपोरेटों के चंगुल से बाहर निकलें और हमारी मातृभूमि के गरीब और शोषित लोगों के पक्ष में खड़े हों। दिलो-दिमाग से अंतर्निरिक्षण करें। तय करें कि आप शोषण करने वाले कारपोरेटों के साथ हैं या भारत की जनता के साथ। 
सम्मान के साथ,
आपका
(सुरवरम सुधाकर रेड्डी)
लोकसभा के पूर्व सदस्य,
महासचिव, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी